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1971 युद्ध के जांबाज हीरो ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह का निधन ,बॉर्डर फिल्म में सनी देओल निभा चुके हैं उनका किरदार

बॉर्डर के असली हीरो ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह का मोहाली स्थित फोर्टिस अस्पताल में शनिवार की सुबह लगभग 9 बजे निधन हो गया। फिल्म बॉर्डर में सनी देओल ने मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी की भूमिका निभायी थी। फिल्म में देश के इस बेटे की वीरता को बखूबी दर्शाया गया था। सन् 1971 में लोंगेवाल की लड़ाई के दौरान मेजर रहे कुलदीप सिंह ने विषम परिस्थितियों में भी गजब का साहस दिखाया था। दुश्मन की टैंक रेजिमेंट के सामने वह न सिर्फ चंद सैनिकों के साथ टिके रहे, बल्कि दुश्मन को धूल भी चटा दी थी।


सन् साल 1997 में जब फिल्म बॉर्डर रिलीज हुई तो यह बड़ी सुपरहिट साबित हुई। कुलदीप सिंह सिर्फ 22 साल की उम्र में ही पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन में शामिल हो गए थे। यह भारतीय सेना की सबसे पुरानी और सम्मानित यूनिट्स में से एक मानी जाती है।

सन् 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में भी कुलदीप सिंह ने भाग लिया था। 4 दिसंबर 1971 को भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अपने 120 सैनिकों की कंपनी के साथ कुलदीप सिंह लोंगेवाल में भारतीय सीमा की रक्षा कर रहे थे, तभी पाकिस्तान की 51वीं इंफैंट्री ब्रिगेड के 3000 सैनिकों ने उनकी पोस्ट पर हमला कर दिया था। यहां उन्होंने दुश्मन को डटकर जवाब दिया। पाकिस्तानी सैनिक कुलदीप सिंह के सैनिकों को छू भी नहीं पाए और सिर्फ दो सैनिक घायल हुए थे। युद्ध के मैदान पर जबरदस्त साहस दिखाने के लिए उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। महावीर चक्र से सम्मानित किए जाने के दौरान उनके संबंध में कहा गया।

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पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का जीवन परिचय और अखिल विश्व गायत्री परिवार

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य भारत के एक युगदृष्टा मनीषी थे जिन्होने अखिल भारतीय गायत्री परिवार की स्थापना की। उन्होंने अपना जीवन समाज की भलाई तथा सांस्कृतिक व चारित्रिक उत्थान के लिये समर्पित कर दिया। उन्होंने आधुनिक व प्राचीन विज्ञान व धर्म का समन्वय करके आध्यात्मिक नवचेतना को जगाने का कार्य किया ताकि वर्तमान समय की चुनौतियों का सामना किया जा सके। उनका व्यक्तित्व एक साधु पुरुष, आध्यात्म विज्ञानी, योगी, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, लेखक, सुधारक, मनीषी व दृष्टा का समन्वित रूप था।




जन्म : २० सितम्बर १९११
जन्म स्थल : आँवलखेड़ा, आगरा, उत्तर प्रदेश, भारत
पिता : श्री पं.रूपकिशोर जी शर्मा जी
पत्नी : श्रीभगवती देवी
मृत्यु : २ जून १९९०
मृत्यु स्थल : हरिद्वार, भारत
अन्य नाम : श्रीराम मत्त, गुरुदेव, वेदमूर्ति, युग ॠषि, गुरुजी
उत्तराधिकारी : श्रीमती शैलबाला और श्री मृत्युंजय शर्मा
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य का जन्म 20 सितम्बर,1911 (आश्विन कृष्ण त्रयोदशी विक्रमी संवत् 1967) को उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद के आंवलखेड़ा गांव में हुआ था। उनका बाल्यकाल गांव में ही बीता। उनके पिता श्री पं.रूपकिशोर जी शर्मा जी जमींदार घराने के थे और दूर-दराज के राजघरानों के राजपुरोहित, उद्भट विद्वान, भगवत् कथाकार थे।

साधना के प्रति उनका झुकाव बचपन में ही दिखाई देने लगा, जब वे अपने सहपाठियों को, छोटे बच्चों को अमराइयों में बिठाकर स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुसंस्कारिता अपनाने वाली आत्मविद्या का शिक्षण दिया करते थे । वह एक बार हिमालय की ओर भाग निकले और बाद में पकडे जाने पर बोले कि हिमालय ही उनका घर है और वहीं वे जा रहे थे ।


महामना पं.मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें काशी में गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी। पंद्रह वर्ष की आयु में वसंत पंचमी की वेला में सन् 1926 में ही लोगों ने उनके अंदर के अवतारी रूप को पहचान लिया था। उन्हें जाति-पाँति का कोई भेद नहीं था। वह कुष्ठ रोगियों की भी सेवा करते थे। इस महान संत ने नारी शक्ति व बेरोजगार युवाओं के लिए गाँव में ही एक बुनताघर स्थापित किया व अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया।

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सहभागिता

भारत के परतंत्र होने की पीड़ा उन्हें बहुत सताती थी. वर्ष 1927 से 1933 तक स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। वे घरवालो के विरोध क्वे बावजूद कई समय तक भूमिगत कार्य करते रहे और समय आने पर जेल भी गए। जेल में भी अपने साथियों को शिक्षण दिया करते थे और वे वहां से अंग्रेजी सिखकर लौटे. जेल में उन्हें देवदास गाँधी, मदन मोहन मालवीय, और अहमद किदवई जैसे लोगो का मार्ग दर्शन मिला ।


राजनीतिक कार्य

श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के प्रभाव से राजनीति में प्रवेश करने के बाद शर्माजी धीरे-धीरे महात्मा गांधी के अत्यंत निकट हो गए थे। 1942 से पूर्व के आठ-दस वर्षों तक वे प्रति वर्ष दो मास सेवाग्राम में गांधीजी के पास रहा करते थे। बापू का उन पर अटूट विश्वास था। आचार्य कृपलानी, श्री पुरुषोत्तमदास टंडन, पं. गोविंदवल्लभ पंत, डॉ. कैलासनाथ काटजू आदि नेताओं के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे। 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन के समय शर्माजी को उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) तथा मध्य प्रदेश का प्रभारी नेता नियुक्त किया गया था। इसके पूर्व मैनपुरी षड्यंत्र केस में उनका सहयोग रहा था। विचारों तथा कर्मों से क्रांतिकारी शर्माजी 1942 के आगरा षड्यंत्र केस के प्रमुख अभियुक्त थे। केस का नाम था किंग एम्परर v/s श्री राम शर्मा एड अधर्स .इस मुकदमे में 14 अभियुक्त थे। शर्माजी के बड़े पुत्र रमेशकुमार शर्मा, उनकी बेटी कमला शर्मा के साथ उनके बड़े भाई पं. बालाप्रसाद शर्मा पकड़े गए थे। अंत में 1945 में सब लोग जेल से रिहा हुए। गिरफ्तारी और जेल-प्रवास के दौरान शर्माजी के तीन पुत्रों की मृत्यु हो गई और पुलिस की मारपीट के कारण उनका एक कान भी फट गया था। जेल से छूटने के बाद वे सीधे गांधीजी के पास गए थे। महात्मा गांधी की हत्या के बाद वे लेखन कार्य में ही अधिक रत रहे। जीवन के अंतिम 8-10 वर्षों में उन्होंने नेत्रहीन अवस्था में पांच पुस्तकें बोलकर लिखीं। उन्होंने अपने जीवन दरमियान करीबन ३२०० से ज्याद अलग अलग भाषा में पुस्तके लिखी | ‘ग्लोकोमा' के कारण उनके दोनों नेत्रों की ज्योति जाती रही थी।

मृत्यु

दो जून सन् 1990 को गंगा दशहरा के दिन पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ब्रह्मलीन हुए थे। तब से शांतिकुंज में गंगा दशहरा के साथ गायत्री जयंती और आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा का महानिर्वाण दिवस साथ-साथ मनाया जाता है। शुक्रवार को इस अवसर पर शांतिकुंज में तीन दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत हुई।

अखिल विश्व गायत्री परिवार 

 पंडित श्रीराम शर्मा आचार्यजी ने अखिल विश्व गायत्री परिवार की स्थापना शांतिकुज नाम से हरिद्वार में की थी |गंगा नदी के किनारे बहुत ही विशाल जगा पर माँ गायत्री का मंदिर की स्थापन की है| इसके अतिरिक्त उनके दामाद श्रेद्धेय डॉ .प्रणव पंड्याजी ने उनका बहुत विकास किया और पूरी दुनिया में गायत्री परिवार के जरिये भारतीय संस्कृति की मिशाल कायम की है | उन्हों ने बच्चे आगे पढ़ शके इस हेतु से विश्व विद्यालय की भी स्थापना की हे | एक बार हरिद्वार जाए तो शांतिकुंज और विश्वविद्यालय की मुलाकात जरुर ले | ज्यादा जानने के लिए क्लिक करे ..
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जाने शिक्षक दिवस ( टीचर्स डे ) कब और कैसे मनाया जाता है और जाने डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन के बारे में

हर साल 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस  मनाया जाता है। ये दिन है, जब आप उन लोगों के प्रति अपना प्यार और सम्मान दर्शाते हैं, जिनसे आपको जीवन में कुछ खास सीखने को मिला है।इस दिन स्टूडेंट्स अपने टीचर्स  को ग्रीटिंग कार्ड और गिफ्ट्स देते हैं. स्टूडेंट्स अपने-अपने तरीके से शिक्षकों के प्रति प्यार और सम्मान को प्रकट करते हैं. स्कूलों और कॉलेजों में टीचर्स डे सेलिब्रेशन  की तैयारी 5 सितंबर से कुछ दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं ।प्राचीन काल से ही गुरूओं का हमारे जीवन में बड़ा योगदान रहा है। गुरूओं से प्राप्त ज्ञान और मार्गदर्शन से ही हम सफलता के शिखर तक पहुंच सकते हैं। शिक्षक दिवस सभी शिक्षकों और गुरूओं को समर्पित है। इस दिुन शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है।


शिक्षक दिवस का इतिहास 

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंति 5 सितंबर को होती है। उनके जन्मदिन के मौके पर पूरा देश 5 सितंबर को शिक्षक दिवस  के रूप में मनाता है। राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद और महान दार्शनिक थे।उनका कहना था कि जहां कहीं से भी कुछ सीखने को मिले उसे अपने जीवन में उतार लेना चाहिए।वह पढ़ाने से ज्यादा छात्रों के बौद्धिक विकास पर जोर देने की बात करते थे। वह पढ़ाई के दौरान काफी खुशनुमा माहौल बनाकर रखते थे।1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

शिक्षक दिवस कैसे मनाया जाता है? 

इस दिन हर स्कुल और कोलेज में प्रमुख छात्र एक दिन के लिए शिक्षक बनते है और सारा शिक्षण कार्य करते है | सभी छात्र  डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन को याद करते है , इनाम वितरण कार्यक्रम का आयोजन करते है | सभी छात्र दिन के अंत में सभी छात्र और शिक्षको के सामने उनका अनुभव बोलते है | राज्य सरकार और जिला पंचायत द्वारा जो शिक्षक अच्छे अच्छे कार्य करते है और उत्क्रुस्थ कार्य करते है उनको श्रेष्ठ शिक्षक अवोर्ड का आयोजन करते है | 



जानिए डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन के बारे में 

डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन  भारत के मद्रास प्रांत के तिरुतनि नामक स्थान पर गरीब ब्राह्मण परिवार में 5 सितंबर 1888 में पैदा हुए थे। अपने जीवन के बाद के समय में वो देश के पहले उप राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति चुने गये थे। वो एक अच्छे व्यक्ति, दर्शनशास्त्री, आदर्शवादी, शिक्षक और एक प्रसिद्ध लेखक थे।




पूरा नाम : डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
जन्म : 5 सितंबर, 1888
जन्म भूमि : तिरूतनी, तमिलनाडु
मृत्यु   : 17 अप्रैल, 1975
मृत्यु स्थान  : चेन्नई, तमिलनाडु
पिता : सर्वपल्ली वीरास्वामी, 
माता : सीताम्मा
पत्नी :  सिवाकामू
संतान  : पाँच पुत्री, एक पुत्र
पद  : भारत के दूसरे राष्ट्रपति
कार्य काल : 13 मई, 1962 से 13 मई, 1967
शिक्षा :एम.ए.
विद्यालय : क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज
पुरस्कार-उपाधि : भारत रत्न 

बचपन से शिक्षक बनने का सपना 1909 में जाकर पूरा हुआ।जब डॉ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन मद्रास के एक विश्वविध्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर पद पर नियुक्त हुए। इन्होने कलकता और मैसूर विश्वविध्यालयों में प्रोफ़ेसर के पद पर, काशी तथा आंध्रप्रदेश युनिवर्सिटी के कुलपति पद पर भी कार्य किया।

इसके अतिरिक्त डॉ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन जी ने कई राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय मंचो और संगठनो में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। प्रसिद्ध ऑक्स्फ़र्ड युनिवर्सिटी में भी आप दर्शनशास्त्र विषय के प्रोफ़ेसर पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्ष 1948 में डॉ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन सयुक्त राष्ट्र संघ के यूनिस्को की एग्जीक्यूटिव कमेटी के अध्यक्ष पद पर भी कार्य कर चुके हैं। वर्ष 1952 में डॉ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति चुने गये जो 1962 तक इस पद पर बने रहे। 1962 में राधाकृष्णन देश के दूसरें राष्ट्रपति बने जो 1967 तक इस पद पर बने रहे ।

डॉ. राधाकृष्णन के नाम में पहले सर्वपल्ली का सम्बोधन उन्हे विरासत में मिला था। राधाकृष्णन के पूर्वज ‘सर्वपल्ली’ नामक गॉव में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में वे तिरूतनी गॉव में बस गये। लेकिन उनके पूर्वज चाहते थे कि, उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के गॉव का बोध भी सदैव रहना चाहिए। इसी कारण सभी परिजन अपने नाम के पूर्व ‘सर्वपल्ली’ धारण करने लगे थे।

राजनीती में कदम रखने से पूर्व राधाकृष्णन जी ने निरंतर 40 वर्षो तक अध्यापन का कार्य करवाया।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की किताबें

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान दर्शनशास्त्री और लेखक भी थे. उन्होंने अंगेरजी भाषा में 60 से अधिक पुस्तके लिखी जिनमे से प्रमुख किताबे निचे दी गई है |

भारत और चीन
भारत और विश्व
भारत की अंतरात्मा
भारतीय संस्कृति कुछ विचार
भारतीय दर्शन 1
भारतीय दर्शन 2
गौतम बुद्ध जीवन और दर्शन
नवयुवकों से
प्रेरणा पुरुष
स्वतंत्रता और संस्कृति
उपनिषदों का सन्देश

इस महान आत्मा का 16 अप्रैल, 1975 को निधन हो गया लेकिन उनके आदर्श और विचार आज भी हमे प्रेरित करते है|
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श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी जीवन सफ़र

अटल बिहारी बाजपेयी ही एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद संभाला। वह भारत के सबसे सम्माननीय और प्रेरक राजनीतिज्ञों में से एक रहे। वाजपेयी ने कई विभिन्न परिषदों और संगठनों के सदस्य के तौर पर भी अपनी सेवाएं दीं। वाजपेयी एक प्रभावशाली कवि और प्रखर वक्ता थे।श्री अटल बिहारी वाजपेयी भारत माता के एक ऐसे सपूत हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता से पूर्व और पश्चात भी अपना जीवन देश और देशवासियों के उत्थान एवं कल्याण हेतु जीया तथा जिनकी वाणी से असाधारण शब्दों को सुनकर आम जन उल्लासित होते रहे और जिनके कार्यों से देश का मस्तक ऊंचा हुआ ।


वास्तविक नाम : अटल बिहारी वाजपेयी
उपनाम : अटल जी
व्यवसाय : भारतीय राजनेता 
जन्मतिथि : 25 दिसंबर 1924
जन्मस्थान : ग्वालियर राज्य, ब्रिटिश भारत (अब, मध्य प्रदेश, भारत)
पिता :  कृष्ण बिहारी वाजपेयी (कवि और स्कूल मास्टर)
माता : कृष्णा देवी
भाई: अवध बिहारी वाजपेयी, प्रेम बिहारी वाजपेयी, सुदा बिहारी वाजपेयी
बहन:  उर्मिला मिश्रा, विमला मिश्रा, कमला देवी
शैक्षिक योग्यता  : 

ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज (अब लक्ष्मी बाई कॉलेज) से हिंदी
अंग्रेजी और संस्कृत के साथ स्नातक दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज,
कानपुर से राजनीति विज्ञान में एम.ए (M.A)

पुरस्कार    : 1992 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
                   1994 में सर्व श्रेष्ठ सासंद पुरस्कार दिया गया।
                   2015 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 
मृत्यु: अगस्त 16, 2018 (उम्र 93), एम्स हॉस्पिटल, नई दिल्ली, भारत 

प्रारंभिक जीवन 

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को हुआ। वह अपने पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और माता कृष्णा देवी के सात बच्चों में से एक थे। उनके पिता एक विद्वान और स्कूल शिक्षक थे।इन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज - जो अब लक्ष्मीबाई कॉलेज कहलाता है - में तथा कानपुर उ. प्र. के डी. ए. वी. कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की और राजनीति विज्ञान में एम. ए.की उपाधि प्राप्त की. सन् 1993 मे कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा दर्शन शास्त्र में पी.एच डी की मानद उपाधि से सम्मानित किए गए.

वाजपेयी की राजनैतिक यात्रा

वाजपेयी की राजनैतिक यात्रा की शुरुआत एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हुई। 

1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण वह अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिए गए। इसी समय उनकी मुलाकात श्यामा प्रसाद मुखर्जी से हुई, जो भारतीय जनसंघ यानी बी.जे.एस. के नेता थे। उनके राजनैतिक एजेंडे में वाजपेयी ने सहयोग किया। स्वास्थ्य समस्याओं के चलते मुकर्जी की जल्द ही मृत्यु हो गई और बी.जे.एस. की कमान वाजपेयी ने संभाली और इस संगठन के विचारों और एजेंडे को आगे बढ़ाया। 

सन 1954 में वह बलरामपुर सीट से संसद सदस्य निर्वाचित हुए। छोटी उम्र के बावजूद वाजपेयी के विस्तृत नजरिए और जानकारी ने उन्हें राजनीति जगत में सम्मान और स्थान दिलाने में मदद की। 

वर्ष 1957 में, उत्तर प्रदेश के बलरामपुर निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार (दूसरे आम चुनावों में) अटल जी को लोकसभा के लिए चुना गया था।

सन 1977 में जब मोरारजी देसाई की सरकार बनी, वाजपेयी को विदेश मंत्री बनाया गया। दो वर्ष बाद उन्होंने चीन के साथ संबंधों पर चर्चा करने के लिए वहां की यात्रा की। भारत पाकिस्तान के 1971 के युद्ध के कारण प्रभावित हुए भारत-पाकिस्तान के व्यापारिक रिश्ते को सुधारने के लिए उन्होंने पाकिस्तान की यात्रा कर नई पहल की। जब जनता पार्टी ने आर.एस.एस. पर हमला किया, तब उन्होंने 1979 में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 

सन 1980 में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखने की पहल उनके व बीजेएस तथा आरएसएस से आए लालकृष्ण आडवाणी और भैरो सिंह शेखावत जैसे साथियों ने रखी। स्थापना के बाद पहले पांच साल वाजपेयी इस पार्टी के अध्यक्ष रहे।

सन 1992 में देश की उन्नति में योगदान के लिए पद्म विभूषण पुरस्कार दिया गया।

सन 1996 में  पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने।

सन 1998 में  दूसरी बार भी देश के प्रधानमंत्री बने।

सन 1999 में  तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने और दिल्ली से लाहौर के बीच बस सेवा संचालित कर इतिहास रचा ।

सन 2005 में  दिसंबर माह में राजनीति से संन्यास ले लिया।

सन 2015 में  देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।

एक अनुभवी राजनीतिज्ञ और उत्कृष्ट सांसद होने के अलावा, अटल बिहारी वाजपेयी एक प्रसिद्ध कवि और सभी राजनीतिक दलों में सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं।

वाजपेयी समस्त जीवन अविवहित रहे। उन्होंने राजकुमारी कौल और बीएन कौल की बेटी नमिता भट्टाचार्य को गोद लिया था।

मृत्यु

 

सन 2009 में उन्हे दौरा पड़ा था, जिसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता ही गया।  11  जून 2018 को उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया गया था, जहाँ 16 अगस्त 2018 को वे परलोक सिधार गये। 17 अगस्त को उनकी दत्‍तक पुत्री नमिता कौल भट्टाचार्या मुखाग्नि दी। राजघाट के पास शान्ति वन में स्मृति स्थल में उनकी समाधि बनायी गयी है।
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इंदिरा गांधी जयंती - इंदिरा गाँधी , प्रियदर्शनी गाँधी का परिचय-भारत की प्रथम और एक मात्र महिला वडाप्रधान

इंदिरा गांधी भारत देश की शक्तिशाली प्रथम महिला वडा प्रधान जो  'प्रियदर्शनी' के नाम से जानी जाती है । यहाँ इस पोस्ट में इंदिरा गाँधी जन्म जयंती और इंदिरागाँधी का जीवन परिचय के बारे लिखा गया है , आशा है आपको पसंद आएगा ।




इंदिरा गाँधी जयंती हर साल १९ वि नवम्बर को मनाया जाता है।इस दिन पुरे देश में जगह जगह पर जुलुश निकले जाते है और  प्रार्थना सभा , सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया जाता है।श्रंद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाता है। अनेक शैक्षिक संस्थानों में इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। कांग्रेस मुख्यालय एवं अन्य कार्यालयों में विशेष आयोजन किये जाते हैं। इन्दिरा गांधी की मूर्ति पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धा अर्पित की जाती है।


इंदिरा गाँधी का परिचय 



पूरा नाम : इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी
जन्म दिनाक : १९ नवम्बर , १९१७
जन्म स्थल : इलाहाबाद -उत्तर प्रदेश
पिता का नाम : पंडित जवाहरलाल नेहरु
माता : कमला नहेरु
पति : फ़िरोज़ गाँधी
संतान : राजीव गाँधी , संजय गाँधी
मृत्यु : ३१  अक्टूबर, १९८४ , नई दिल्ली


श्रीमती इंदिरा गाँधी का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में श्रीमंत नहेरु परिवार में हुआ था । श्रीमती इंदिरा गाँधी स्वंत्रत भारत की पहली महिला वाडा प्रधान थे । उनके पिता जवाहरलाल नहेरु स्वतंत्र भारत के पहले वडा प्रधान थे ।बचपन से ही देश प्रेम और राजनैतिक मूल्यों को अपने दिल में रखकर वे अपने पिता जवाहरलाल नेहरू के साथ ही रहते थे और राजनैतिक नीतिओ की भी शिक्षा ली ।कवि श्री रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें 'प्रियदर्शनी ' नाम दिया था । उनको दुशरे नाम 'इंदु ' और गूंगी गुडिया ' के नाम से भी पहचाने जाते थे ।इंदिरा गाँधी बचपन से ही भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में जुड़े हुए थे ।उनके पिता सक्रीय राजकारणी होने के कारण घर में सदा राजनीती का माहोल रहता था , उसी माहोल में इंदिराजी का पालन पोषण हुआ।उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय बंगाल, इंग्लैंड की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, शांति निकेतन में अपनी शिक्षा पूर्ण की ।

सन १९४२ में उन्होंने अपने पिता की इच्छा के बिना फ़िरोज़ गाँधी पारशी युवक के साथ शादी की । शादी के बाद संजय गाँधी और राजीव गाँधी दो पुत्रो को जन्मा दिया ।सन १९६४ में पिता जवाहरलाल नहरू के अवसान के बाद कोंग्रेस पक्ष द्वारा राज्यसभा के सभ्य नियुक्त किये ।फिर वे उस समय के वडाप्रधान लालबहादुर शास्त्री की सर्कार में प्रधान बने ।लालबहादुर शास्त्री का सन १९६६ में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु होने से कोंग्रेस पक्ष ने इंदिराज को भारत के वडा प्रधान के रूप में नियुक्ति की ।१० साल तक वे भारत के वडा प्रधान रहे ।फिर वो १९८० में फिर से वो वडा प्रधान बने ।

श्रीमती इंदिरा गांधी कमला नेहरू स्मृति अस्पताल, गांधी स्मारक निधि और कस्तूरबा गांधी स्मृति न्यास जैसे संगठनों और संस्थानों से जुडी हुई थीं। वे स्वराज भवन न्यास की अध्यक्ष थीं। वह बाल सहयोग, बाल भवन बोर्ड और बच्चों के राष्ट्रीय संग्रहालय के साथ जुड़ीं।श्रीमती गांधी ने इलाहाबाद में कमला नेहरू विद्यालय की स्थापना की थी।वह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और पूर्वोत्तर विश्वविद्यालय जैसी कुछ बड़ी संस्थानों के साथ जुडी रहीं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय न्यायालय, 1960-64 में यूनेस्को के भारतीय प्रतिनिधिमंडल, 1960-1964 में यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड और 1962 में राष्ट्रीय रक्षा परिषद के सदस्य के रूप में कार्य किया। वह संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय एकता परिषद, हिमालयन पर्वतारोहण संस्थान,दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, नेहरू स्मारक संग्रहालय, पुस्तकालय समाज और जवाहर लाल नेहरू स्मृति निधि के साथ जुडी रहीं।

सन १९७५ में आपातकाल १९८४ में सिख दंगा जैसे कई मुद्दो पर इंदिरा गाँधी को भारी विरोध-प्रदर्शन और तीखी आलोचनाए का सामना करना पड़ा था । उसके बावजूद भी इंदिराजी ने १९७१ के युद्ध में विश्व शक्तिओ के सामने न झुकने के नीतिगत और समयानुकूल निर्णय क्षमता से पाकिस्तान को हरा दिया और बांग्लादेश को मुक्ति दिलाकर भारत देश को समग्र विश्व में गौरवपूर्ण क्षण दिलवाया । उस समय उन्हें "भारत रत्न " से सन्मानित किया गया ।

सन १९८० से १९८४ के समय में जब उनका वडाप्रधान काल चल रहा था तब पंजाब के बटवारे के समय स्वर्ण मंदिर पर आंतकवादियो के सामने हिन्दुस्तानी लश्कर के गोलीबार का हुकुम इंदिरा जीने दिया। उसी समय वहा करीबन १००० निर्दोष लोग मरे गए उसमे ४९० जितने सिख युवान मरे गए । इस हमले के प्रतिकार में पाँच महीने के बाद ही ३१ अक्टूबर १९८४ को श्रीमती गाँधी के आवास पर तैनात उनके दो सिक्ख अंगरक्षकों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।

आखिर में श्रीमती इन्दिरा गांधी एक ऐसी महिला थीं, जो न केवल भारतीय राजनीति पर छाई रहीं बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वह विलक्षण प्रभाव छोड़ गईं। उन्हें 'लौह महिला' के नाम से भी संबोधित किया जाता है। अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता के लिए 'विश्वराजनीति' के इतिहास में इन्दिरा गांधी का नाम सदैव याद रखा जायेगा।
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी (मोहनदास करमचंद गाँधी) के बारे में संपूर्ण जानकारी

इस पोस्ट  में हम आपको हमारे राष्ट्रपिता 'महात्मा गांधीजी ' के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे |

पूरा नाम: मोहनदास करमचंद गाँधी 
जन्म स्थान: पोरबंदर , गुजरात , भारत 
जन्म दिनाक : २ अक्टूम्बर . १८६९
पिता : करमचंद गाँधी
माता: पुतलीबाई 
अभ्यास : एल .एल बी , वकीलात 
पुत्र: हरिलाल,मणिलाल , रामदास , देवदास 
मृत्यु: ३० जनवरी १९४८  ,दिल्ही  



" देदी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल , साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल ", ये पंक्ति जिनके लिए बनायीं गयी है वो  साबरमती के संत "महात्मा गांधीजी" जिसे हम प्यार से 'बापू ' बुलाते है इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी है | गांधीजी ने अपनी मेट्रिक परीक्षा  राजकोट की आल्फ्रेड हाइस्कुल में से पूरी की|कालेज की पढाई शामलदास कालेज भावनगर में प्रथम सत्र पूर्ण करके लंडन पहुच गए , और वहा से बेरिस्टर की पदवी प्राप्त करके भारत परत आ गए | उसके बाद वो मुंबई और राजकोट की असफल वकीलात बाद  दक्षीण आफ्रिका पहुचे|१८९४ में वहा के हिन्दियो के हक के लिए 'नाताल इंडियन कोंग्रेस 'की स्थापना की |फिर दक्षीण आफ्रिका में हुए भारतीयों से अन्याय के करान सन १९१५ में वे भारत लौटे और अहमदबाद में 'सत्याग्रह आश्रम ' की स्थापना की | 

गांधी जी ने वर्ष १९१७-१८के दौरान बिहार के चम्‍पारण नामक स्‍थान के खेतों में पहली बार भारत में सत्‍याग्रह का प्रयोग किया। यहाँ अकाल के समय ग़रीब किसानों को अपने जीवित रहने के लिए जरूरी खाद्य फ़सलें उगाने के स्‍थान पर नील की खेती करने के लिए ज़ोर डाला जा रहा था।उस समय गांधीजी ने अंग्रेजो के सामने सत्याग्रह करके उनको उनका हक दिलवाया |सन १८१८ में 'खेडा सत्याग्रह' किया| सन १८१९ में 'रोलेक्ट एक्ट ' का विरोध किया|सन १९२० में इंडियन नॅशनल कोंग्रेस के सहकार से 'असहकार आन्दोलन ' की शुरुआत की  उसी ही वर्ष में उस कार्यक्रम के भाग के रूप में गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की | सन १९२२ में अंग्रेज अमलदारो ने गांधीजी को बंदी बनाया और जेल में ले गए |दो साल बाद १९२४ में उनको रिहा किये गए |सन १९२४-२५ में 'अस्पृश्यता निवारण ' और ' खादी के उत्पादन का रचनात्मक कार्य की शुरुआत की | 'हरिजन बंधू ' और 'हरिजन सेवक ' वृत पत्रों का संपादन किया | १९२८ में बारडोली सत्याग्रह में सहयोग दिया | सन १९३० में नमक के कायदे के लिए दांडी यात्रा आरंभ की और वहा नमक का कानून तोड़ दिया और अंग्रेज सरकार को जुका दिया| सन १९४२ में उन्होंने 'हिन्द छोड़ो 'आन्दोलन के बाद अंग्रेजो भारत से नकल जायेंगे वह तय कर दिया | आखिर में सन १९४७ की १५ अगस्त को भारत देश स्वंतंत्र हो गया | 

सदियों से गुलाम बने भारत देश को स्वतंत्र कराना गांधीजी का सबसे बड़ा महान कार्य था |दुनिया के इतिहास में यह एक नया प्रयोग था , इसी लिए गांधीजी 'युग पुरुष ' कहलाए |गांधीजी पवित्र ह्दय  के महापुरुष और महान समाज सुधारक थे | उन्होंने नए समाज की नीव डाली |अछूतो की दुर्दशा उनसे देखि न  गई और उन्होंने उनका उद्धार  करने का बीड़ा उठाया |गरीब भारत को उन्होंने तकली और चरखे द्वारा रोजी रोटी दी |मद्य-निषेध , नीरक्षरता-निवारण , स्त्री -शिक्षा, ग्रामोद्वार आदि के लिए उन्होंने राष्ट्रभाषा का प्रचार किया और हिन्दू -मुस्लिम एकता के लिए वे आजीवन प्रयत्न करते रहे| 

गांधीजी सत्य और अहिंसा के पूंजारी थे | उनके जीवन में सादगी की महक आती थी | दुर्बल शरीर और घुटनों से ऊँची एकमात्र धोती पहननेवाले गांधीजी भारत की गरीबी के प्रतिक थे | दया , धर्मं और प्रेम की त्रिवेणी उनके हदय से लगातार बहा करती थी | अंग्रेजो के प्रति भी वो सदा क्षमाशील रहे | दक्षीण  अफ्रीका में जिस मीर आलम पठान ने उनके दात तोड़ दिए थे , उसे भी उन्होंने जेल से छुडाया और अभय दान दिया |वे अन्याय को दूर करने के लिए अपने जीवन को भी दाव पे लगा देने से नहीं डरते थे |आखिर में ३० जनवरी १९४८  की शाम को जब वह एक प्रार्थना सभा में भाग लेने जा रहे थे, तब एक युवा हिन्दू कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी |

सचमुच , गांधीजी ने अपना सर्वस्व न्योछावर करके वर्त्तमान भारत का नवनिर्माण किया | वास्तव में वे हमारे राम, महावीर और बुद्ध थे | 

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