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कार्तिक पूर्णिमा देव दिवाली के स्नान का विशेष महत्व

आप सभी जानते है भारत की पवित्र धार्मिक नदियों में स्नान का हिन्दू धर्म में अत्यधिक महत्व बताया गया है | पर सबसे ज्यादा महत्व का दिन कार्तिक महीने के पूर्णिमा को माना जाता है | माना जाता है की इस दिन स्नान करने से एक हजार बार किये गए गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है |

इस दिन वाराणसी काशी में देव दिवाली त्योहार धूम धाम से मनाया जाता है | मान्यता है कि इस दिन गंगा घाट पर देवता मनुष्यों के साथ दिवाली मनाने आते है |

साथ में यह भी मान्यता है कुम्भ में किये गये स्नान का जितना महत्त्व है उतना ही कार्तिक माह की पूर्णिमा को स्नान के बाद फल प्राप्त होता है |

सूर्योदय पूर्व करे स्नान

यदि आप अधिक से अधिक स्नान द्वारा पुण्य कमाना चाहते है तो स्नान आप सूर्य उदय से पूर्व करे | पवित्र नदियों में स्नान से पूर्व अपने हाथ पैर पहले धो ले फिर आचमन करे और फिर स्नान के समय हाथ में कुशा लेकर स्नान करे |स्नान करते समय आधा शरीर जल में रहे और भगवान शिव विष्णु का ध्यान करते रहे |



पीपल को जल दे और दीप जलाये

लक्ष्मी जी और त्रिदेवो का वास पीपल के पेड़ में बताया गया है | इस दिन स्नान के बाद पीपल के वृक्ष की पूजा करे और जल चढ़ाये और संध्या को दीपदान करे | इससे धन लक्ष्मी प्रसन्न होती है और सुख सम्पति प्रदान करती है |

घर में कैसे करे कार्तिक पूर्णिमा का स्नान

यदि आप पवित्र नदियों पर नही जा सकते तो आप घर में भी इस स्नान का कुछ लाभ ले सकते है | आप नहाने के पानी में पवित्र जल गंगा का मिला कर स्नान कर ले | इसके बाद भगवान सूर्य को जल से अर्घ्य जरुर दे |

पवित्र स्नान के बाद और क्या अच्छे कर्म करे

कार्तिक पूर्णिमा के गंगा स्नान के बाद आप फिर भगवान की भक्ति , गरीबो को दान दक्षिणा , हवन, यज्ञ आदि करके पुण्य कमा सकते है | दान में आप अन्न दान , वस्त्र दान और अर्थ दान दे सकते है | इस दिन दिया गया दान आपके बुरे समय में काम आता है |
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दिवाली पूजा के लिए विशेष पूजा सामग्रियाँ उनका उपयोग और क्या लाभ होता है इसके बारे में जानिए

दिवाली के दिन हर कोई अपने घर में पूजा करता है अपने घर और परिवार के सुख शांति, समृद्धि, व्यापार वृद्धि के लिए, लेकिन यदि आप दिवाली के दिन कुछ विशेष पूजा वस्तुओ का प्रयोग करें जो की माता लक्ष्मी, देवी काली और भगवान गणेश को अत्यधिक प्रिय होती है तो आपको इसके विशेष लाभ प्राप्त होते हैं।
 


विशेष लाभ का अर्थ है की न केवल आपके घर में धन, वैभव, सुख, समृद्धि, आएगी बल्कि इन सबसे जुडी हुई समस्याओं का भी निवारण होगा, इसके अलावा इन विशेष सामग्रियों का प्रयोग करने से अन्य लाभ भी प्राप्त होते हैं।


दिवाली पूजा के लिए विशेष पूजा सामग्रियाँ

विशेष पूजा सामग्रियाँ निम्नलिखित हैं
गोमती चक्र,
काली हल्दी,
लक्ष्मी कौड़ी,
लघु नारियल,
लाल गुंजा,
सफ़ेद गुंजा,
काली गुंजा,
सफ़ेद और पीली कौड़ियाँ,
कमल गट्टे के बीज,
काले घोड़े की नाल,
गोरोचन,
कामाख्या सिन्दूर,
हल्दी माला,
वैजन्ती माला,

इन पूजन वस्तुओ के प्रयोग करने से लाभ:

यदि आप इन वस्तुओ का प्रयोग धनतेरस, नरक चतुर्दशी या दिवाली पर करते हैं तो आपको निम्न लाभ प्राप्त होंगे:
धन से सम्बंधित सभी समस्याओं का निवारण होगा,
कर्ज से छुटकारा मिलेगा और कर्ज नहीं बढ़ेगा,
व्यापार में वृद्धि होगी और सदैव उन्नति के मार्ग पर होगा,
रिलेशनशिप की समस्या समाप्त होगी और विश्वसनीयता बढ़ेगी,
हर कार्य में सफलता प्राप्त होगी और रुके हुए सारे कार्य बनेंगे,
दूकान का बिज़नेस में लाभ प्रपात होगा और साडी नकारात्मक ऊर्जा का नाश होगा,
किसी भी प्रकार का जादू टोना, काला जादू या नजर दोष की समस्या का नाश होगा और रक्षा होगी,
किसी भी प्रकार के क़ानूनी मामले में विजय प्राप्त होगी और मामलो का समाधान जल्दी प्राप्त होगा,
परिवार में सुख शांति आएगी और सभी लोग स्वस्थ्य रहेंगे,
समाज में मान सम्मान बढ़ेगा और प्रतिष्ठा मिलेगी.

इन विशेष पूजन वस्तुओ का प्रयोग दिवाली पर कैसे करें?

अगर आप इनमे से कोई भी पूजा वास्तु प्राप्त करना चाहते हैं और दिवाली पर प्रयोग करना चाहते हैं तो आप इसको हमसे प्राप्त करें किसी अन्य स्थान से नहीं क्योकि हम आपकी समस्या के अनुसार आपको सर्वश्रेष्ठ पूजा वस्तु प्रदान करेंगे और उसी समस्या के अनुसार इसकी सिद्धि करेंगे और आप विशेष रूप से लिखी हुई पूजा विधि भी प्रदान करेंगे।

वस्तु के साथ दी गई पूजा विधि की सहायता से आप इसका पूजन दिवाली, धनतेरस या नरक चतुर्दशी के दिन विधिपूर्वक कर सकते हैं और अपनी मनोकामना को पूर्ण कर सकते हैं।
 
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दीपावली की पूजा में शामिल करें ये चीजें, झट से प्रसन्न होंगी मां लक्ष्मी

हिंदू धर्म में दीपावली का विशेष स्थान है और इस दौरान लोग लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते हैं. इनकी पूजा करके वे अपने घर के लिए सुख-समृद्धि मांगते हैं और इस दौरान वे बहुत ही सतर्क रहकर पूजा करते हैं. दीपावली की पूजा में शामिल करें ये निचे बताई हुई  चीजें, इस विधि के साथ पूजा करने वालों के घर में हमेशा लक्ष्मी जी का वास रहता है| 
 
 


दीपावली के लिए सामान्य पूजन सामग्री (दीपक, प्रसाद, कुमकुम, फल-फूल आदि) के अतिरिक्त ऐसी 12 चीजें और है जिन्हें पूजन में शामिल करनी चाहिए, जिनके बारे में आज के इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे|
 
स्वस्तिक

किसी भी पूजा में स्वस्तिक अवश्य बनाया जाता है. स्वास्तिक की चार भुजाएं उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों दिशाओं को दर्शाती हैं. साथ ही, ये चार भुजाएं ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमों का प्रतीक भी मानी गई हैं| 

पान

ये भी दीपावली पूजा के लिए बहुत शुभ माना जाता है | पान खाने पर जिस प्रकार हमारे पेट की शुद्धि होती है, पाचन तंत्र को मदद मिलती है, ठीक उसी प्रकार पूजा के समय पान रखने पर घर की शुद्धि होती है और वातावरण सकारात्मक और पवित्र बनता है|


खीर

दीपावली पर लक्ष्मी पूजा में मिठाई के साथ ही घर पर बनी खीर भी रखनी चाहिए. शास्त्रों के अनुसा,र खीर लक्ष्मी का प्रिय व्यंजन है| इसीलिए प्रसाद के रूप में खीर अवश्य रखनी चाहिए|

वंदनवार

आम, पीपल और अशोक के नए कोमल पत्तों की माला को वंदनवार कहा जाता है. इसे दीपावली पर मुख्य द्वार पर बांधना चाहिए. इस संबंध में मान्यता है कि सभी देवी-देवता इन पत्तियों की महक से आकर्षित होकर घर में प्रवेश करते हैं|

ईख या गन्ना

महालक्ष्मी का एक रूप गजलक्ष्मी भी है और इस रूप में वे ऐरावत हाथी पर सवार दिखाई देती हैं| लक्ष्मी के ऐरावत हाथी की प्रिय खाद्य-सामग्री ईख यानी गन्ना है| दीपावली के दिन पूजा में गन्ना रखने से ऐरावत प्रसन्न रहते हैं और ऐरावत की प्रसन्नता से महालक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं|

पीली कौड़ी

लक्ष्मी पूजा की थाली में पीली कौड़ियां रखने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है | ये पीली कौड़ियां धन और श्री यानी लक्ष्मी की प्रतीक हैं. पूजा के बाद इन कौड़ियों को तिजोरी में रखने से लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है|

चावल यानी अक्षत

पुराने समय से ही पूजा में चावल का काफी अधिक महत्व बताया गया है | चावल को अक्षत कहा जाता है यानी जो खंडित नहीं है| इस वजह से चावल को पूर्णता का प्रतीक माना जाता है |धार्मिक कार्यों में चावल एक धान के रूप में भी उपयोग किया जाता है | पूजा में चावल रखने के संबंध में एक मान्यता है यह हमारे घर पर कोई काला दाग भी नहीं लगने देता है यानी समाज में हमारी प्रतिष्ठा को बढ़ाता है|

बताशे या गुड़

ये भी दिवाली के लिए शुभ सामग्री है. लक्ष्मी-पूजन के बाद गुड़-बताशे का दान करने से धन में वृद्धि होती है. घर-परिवार में सुख और समृद्धि का विस्तार होता है, इसी वजह से प्रसाद के रूप में बताशे भगवान को अर्पित किए जाते हैं|

लच्छा या धागा

लच्छा कई धागों से मिलकर बनता है, इसीलिए यह संगठन की शक्ति का प्रतीक है, जिसे पूजा के समय कलाई पर बांधा जाता है. इस धागे को रक्षा सूत्र भी कहा जाता है, इसके प्रभाव से हम कई परेशानियों से बचे रहते हैं |

रंगोली

लक्ष्मी पूजा के स्थान, प्रवेश द्वार और आंगन में रंगों से धार्मिक चिह्न कमल, स्वास्तिक, कलश, फूलपत्ती आदि से रंगोली बनाई जाती है | ऐसा माना जाता है कि देवी लक्ष्मी रंगोली की ओर जल्दी आकर्षित होती हैं|
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शारदीय नवरात्रि 2018 कलश स्थापना मुहूर्त - नौ देवियां के नाम और उनके दिन

हिन्दू धर्म मे ब्रह्मुहूर्त सिद्ध माना जाता है। अतः जो साधक ब्रह्मुहूर्त में नित्य पूजन करते है, वो सुबह ब्रह्ममुहूर्त में गायत्री जप अनुष्ठान एवं व्रत का संकल्प ले सकते हैं। लेकिन यदि आप चाहें तो अनुष्ठान व्रत का समूह में सङ्कल्प एक दिन पूर्व मंगलवार 9 अक्टूबर शाम को ले सकते हैं।

नवरात्र व्रत बुधवार 10 अक्टूबर अश्वनि शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से प्रारम्भ है और  गुरुवार 18 अक्टूबर अश्वनि शुक्ल पक्ष नवमी तक है। दशहरा 19 अक्टूबर शुक्रवार को है।


 


अश्वनि शुक्लपक्ष प्रतिपदा तो 9 अक्टूबर सुबह 9 बजकर 16 मिंनट पर ही लग जायेगा। लेकिन हिदू धर्म मे जिस तिथि में सूर्य का उदय होता है, उस तिथि की मान्यता और व्रत उसी दिन से माना जाता है। अतः इस नियमानुसार 10 अक्टूबर को सूर्योदय प्रतिपदा तिथि में है। व्रत 10 अक्टूबर से शुरू होगा शान्तिकुंज हरिद्वार पंचांग के अनुसार। नवरात्र 9 दिन का है इस बार और द्वितीया तिथि में सूर्योदय न होने के कारण वह तिथि नहीं है। पंचमी तिथि में दो बार सूर्योदय होने के कारण पंचमी तिथि दो दिन है।

शारदीय नवरात्रि 2018 कलश स्थापना मुहूर्त


घट स्थापना तिथि व मुहूर्त - 06:22 से 07:25 (10 अक्तूबर 2018)
प्रतिपदा तिथि प्रारंभ – 09:16 (09 अक्तूबर 2018)
प्रतिपदा तिथि समाप्त – 07:25 (10 अक्तूबर 2018)

नौ देवियां और उनके दिन


प्रथम - शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है। (बुध 10 अक्टूबर)

द्वितीय -ब्रह्मचारिणी - इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।(बुध 10 अक्टूबर)

तृतीय - चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली।(गुरु 11 अक्टूबर)

चतुर्थ - कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।(शुक्र 12 अक्टूबर)

पंचमी - स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता।(शनि 13 अक्टूबर एवं रवि 14 अक्टूबर)

षष्ठी - कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि।(सोम 15 अक्टूबर)

सप्तमी - कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली।(मंगल 16 अक्टूबर)

अष्टमी - महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां।(बुध 17 अक्टूबर)

नवमी -d- सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली(गुरु 18 अक्टूबर)
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पितृ श्राद्ध का महत्व , कैसे करते है श्राद्ध और श्राद्ध में ये कम न करे वरना पितृ हो सकते है नाराज

भारतीय संस्कृति में पितर पक्ष का बड़ा महत्व है । इन दिनों में हमारे पितर /पूर्वज जैसे पिता, बाबा, परबाबा, माता, दादी, परदादी नाना, नानी एवं अन्य पितर आदि हमारे घरों में आते हैं और 15 दिनों तक हमारे घरों में रहते हैं । पितृ श्राद्ध का प्रारम्भ अश्विन मास का कृष्ण पक्ष से शुरू होता है। इन सोलह दिनों में हमारे पूर्वज हमारे घरों पर आते हैं और तर्पण मात्र से ही तृप्त होते हैं। इस आर्टिकल में हम आपको पितृ श्राद्ध कैसे करे और श्राद्ध दरमियाँन क्या न करे इस के बारे में बताएँगे |





कैसे करें श्राद्ध

पहले यम के प्रतीक कौआ, कुत्ते और गाय का अंश निकालें (इसमें भोजन की समस्त सामग्री में से कुछ अंश डालें) फिर किसी पात्र में दूध, जल, तिल और पुष्प लें। कुश और काले तिलों के साथ तीन बार तर्पण करें। ऊं पितृदेवताभ्यो नम: पढ़ते रहें। बाएं हाथ में जल का पात्र लें और दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की तरफ करते हुए उस पर जल डालते हुए तर्पण करते रहें। वस्त्रादि जो भी आप चाहें पितरों के निमित निकाल कर दान कर सकते हैं। यदि ये सब न कर सकें तो दूरदराज में रहने वाले, सामग्री उपलब्ध नहीं होने, तर्पण की व्यवस्था नहीं हो पाने पर एक सरल उपाय के माध्यम से पितरों को तृप्त किया जा सकता है। दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके खड़े हो जाइए। अपने दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की ओर करिए। 11 बार पढ़ें..ऊं पितृदेवताभ्यो नम:। ऊं मातृ देवताभ्यो नम: ।

श्राद्ध में क्या न करें 

तेल और साबुन का प्रयोग न करें ( जिस दिन श्राद्ध हो) , शेविंग न करें , जहां तक संभव हो, नए वस्त्र न पहनें। तामसिक भोजन न करें। तामसिक होने के कारण ही इनको निषिद्ध किया गया है। पुरुष का श्राद्ध पुरुष को, महिला का श्राद्ध महिला को दिया जाना चाहिए । यदि पंडित उपलब्ध नहीं हैं तो श्राद्ध भोजन मंदिर में या गरीब लोगों को दे सकते हैं । यदि कोई विषम परिस्थिति न हो तो श्राद्ध को नहीं छोड़ना चाहिए। हमारे पितृ अपनी मृत्यु तिथि को श्राद्ध की अपेक्षा करते हैं। इसलिए यथा संभव उस तिथि को श्राद्ध कर देना चाहिए। यदि तिथि याद न हो और किन्हीं कारणों से नहीं कर सकें तो पितृ अमावस्य़ा को अवश्य श्राद्ध कर देना चाहिए।
 

 

पितरों की शांति के लिए यह भी करें एक माला प्रतिदिन ऊं पितृ देवताभ्यो नम: की करें ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: का जाप करते रहें। भगवद्गीता या भागवत का पाठ भी कर सकते हैं । पितृ दोष प्रबल हो तो यह भी करें उपाय- यदि कुंडली में प्रबल पितृ दोष हो तो पितरों का तर्पण अवश्य करना चाहिए। तर्पण मात्र से ही हमारे पितृ प्रसन्न होते हैं। वे हमारे घरों में आते हैं और हमको आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यदि कुंडली में पितृ दोष हो तो इन सोलह दिनों में तीन बार एक उपाय करिए। सोलह बताशे लीजिए। उन पर दही रखिए और पीपल के वृक्ष पर रख आइये। इससे पितृ दोष में राहत मिलेगी। यह उपाय पितृ पक्ष में तीन बार करना है।ऐसी जानकारी अपने मोबाईल में पाने के लिए हमारे साथ जुड़े रहे , हमारे सोसियल मिडिया ग्रुप को जॉइन करे | जॉइन करने के लिए क्लिक करे
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बदरीनाथ में आज होने वाले मातामूर्ति मेले के बारे में जाने- भगवान बदरीनाथ आज अपनी माता से मिलेंगे

बदरीनाथ में इस बार माता मूर्ति का मुख्य उत्सव आज 21 सितंबर के दिन मनाया जाता है  |  इसी दिन भगवान बदरीनाथ अपनी मां से मिलने की परम्परा को निभाने के लिए बदरीनाथ पुरी से मातामूर्ति मन्दिर जाएंगे। बदरीनाथ केदारनाथ मन्दिर समिति के पीआरओ डॉ. हरीश गौड़ ने यह जानकारी देते हुए बताया कि 20 सितंबर को बदरीनाथ से कुछ दूरी पर स्थित माणा गांव से घंटाकर्ण जी महाराज बदरीनाथ पहुचेंगे। 



कल भारत  के अंतिम गॉव मन से भगवान घंटाकर्ण भगवान भगवान बदरीनाथ को न्योता देने पहुँचे थे ।और भगवान बद्रीनाथ को मातामूर्ती से मिलने का न्योता दिया। आज भगवान नर नारायण की चलविग्रह बद्रीनाथ धाम से मातामूर्ती रवाना होंगी।जो भगवान बदरीनाथ का प्रतिनिधित्व करेगी।कल सुबह 9 बजकर 30 मिनट पर भगवान की डोली हजारों श्रदालुओं की उपस्थिति में को मातामूर्ती के लिये रवाना होगी।हजारो श्रदालु मेला देखने के लिये बदरीनाथ धाम में डेरा डाले हुये है।इस दिन भगवान नर नारायण अपने माँ के दर्शन व भोग पाते है।साल में एक दिन बावन द्वादसी को भगवान नर नारायण अपने माँ से मिलने जाते है।यहाँ पर सेना व आईटीबीपी का भंडारा भी  लगेगा।रावल धर्माधिकारी के अगुवाई में विशेष पूजा अर्चना होगी।भगवान को माणा के ग्रामीणों द्वारा हरियाली चढाई जायेगी।लगभग 5000 श्रदालुओ से अधिक श्रदालुओ की पहुचने की उम्मीद है|



मान्यता है कि वामन द्वादशी पर भगवान नारायण अपनी माता को मिलने वर्ष मे एक बार माता मूर्ति मंदिर पहुंचते हैं। उत्सव में बड़ी संख्या में तीर्थयात्री भी पहुंचेगे। साथ ही विगत वर्षों की तरह गढ़वाल स्काउट और भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) भंडारा आयोजित करेगी तथा कीर्तन-भजनों का आयोजन होगा।ऐसी जानकारी अपने मोबाईल में पाने के लिए हमारे साथ जुड़े रहे , हमारे सोसियल मिडिया ग्रुप को जॉइन करे | जॉइन करने के लिए क्लिक करे
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जानिए श्री गणेशजी का आध्यात्मिक रहस्य उनके हर एक अंग देते है अध्यात्मिक शंदेश

भारत देश की सभ्यता संस्कृति का त्यौहार एक अभिन्न अंग है । त्यौहार हमारे जीवन में विभिन्न प्रकार की खुशियां,  उमंग उत्साह लेकर आते हैं इन्हीं त्यौहारों में से एक त्यौहार गणेश चतुर्थी है ।

गणेश जी के पूरे शरीर को सिर को अलग कर के देखेंगे तो मनुष्य का ही शरीर दिखता है परंतु इस शरीर को हाथी का चेहरा दिया गया है इसीलिए उन्हें गजधर कहते हैं जिनमें हाथी के समान अंग दिखाई दिए हैं । आंख, कान,  सूंड, दांत आदि । परंतु इन सभी के पीछे जो आध्यात्मिक रहस्य है वह इस प्रकार है ।


सूंड

सूंड आध्यात्मिक शक्ति की प्रतीक है । हाथी की सूंड इतनी मजबूत और शक्तिशाली होती है कि वह वृक्ष को भी उखाड़ कर,  सूंड में लपेटकर ऊपर उठा लेता है । गोया वह एक बुलडोजर और क्रेन दोनों का कार्य एक साथ कर सकता है ।  साथ ही छोटे-छोटे बच्चों को भी प्रणाम करता है,  किसी को पुष्प अर्पित करता है, पानी का लोटा चढ़ाकर पूजा करता है, सुई जैसी सुक्ष्म चीज को भी उठा लेता है । ज्ञानवान व्यक्ति भी अपने मूल आदतों को जड़ों से उखाड़कर फेंकने में समर्थ होता है । सुक्ष्म से सुक्ष्म बातों को भी धारण करने के लिए, दूसरों को सम्मान,स्नेह और आदर देने में वह कुशल होता है । अपने पुराने संस्कारों को जड़ से पकड़कर निकाल फेंकने के लिए भी हाथी की सूंड जैसी उसमें आध्यात्मिक शक्ति होती है । इस तरह हाथी की सूंड ज्ञानी व्यक्तियों की क्षमताओं का प्रतीक हैं ।

कर्ण

उनके कान पंखे जैसे बड़े बड़े होते हैं बड़े-बड़े खुले कान हमें यह शिक्षा देते हैं कि आवश्यक एवं महत्वपूर्ण बात चाहे वह स्व के प्रति हो या अन्य के प्रति से ध्यान से सुने । कान को मुख्य ज्ञानेंद्रिय माना गया है । गुरु भी जब अपने शिष्य को मंत्र देते हैं तो उसके कान में ही उच्चारण करते हैं । भगवान ने जब गीता ज्ञान दिया तो अर्जुन ने कानों के द्वारा ही उसे सुना । अतः बड़े-बड़े कान, ज्ञान श्रवण के प्रतीक हैं । वे ध्यान से, जिज्ञासापूर्वक, ग्रहण करने की भावनाओं को भावना से, पूरा चित्त देकर सुनने के प्रतीक हैं । ज्ञान की साधना में श्रवण, मनन और निज अध्ययन  यह तीन पुरुषार्थ बताए गए हैं । इनमें सबसे प्रथम श्रवण  है । ज्ञान के सागर परमात्मा के विस्तृत ज्ञान का श्रवण इन बड़े कानों से समुचित करना ही इसका प्रतीक है ।

आंखें

उनकी आंखे दिव्य दृष्टि वाली होती है उसे छोटी चीज भी बड़ी दिखाई देती है । यदि उसे छोटी चीज भी दिखाई नहीं देती तो वह सबको अपने पांव के नीचे रौंदता चला जाता । दूसरा उनकी आंखें छोटी लेकिन दूरदर्शिता का प्रतीक होती हैं । हमारे जीवन में कई सुक्ष्म बातें,.रहस्यपूर्ण बातें  होती हैं जिन्हें दूरदर्शिता को ध्यान में रखते हुए, उनके परिणाम को देखते हुए,  फिर अपनानी चाहिए । ज्ञानवान व्यक्ति का भी एक गुण होता है । वह छोटो में भी बढ़ाई देखता है । हर एक की महानता उसके सामने उभरकर आती है और सब का सब को आदर देता है उसके मन को अपने शब्दों से रौधता नहीं है ।

महोदर

बोलचाल की भाषा में यह कहा जाता है कि इसका तो पेट बड़ा है इनको कोई भी बात सुना दी जाए तो वह बाहर नहीं निकलती हैं । गणेश जी का पेट बहुत बड़ा होता है । जो कि समाने की शक्ति का प्रतीक है । ज्ञानवान व्यक्ति के सामने भी निंदा स्तुति,  जय-पराजय ऊंच-नीच की परिस्थितियां आती है परंतु वह उनको स्वयं में संभाल लेता है । गणेश जी का लंबा पेट अथवा बड़ा पेट ( महोदर ) ज्ञानवान के इसी गुणों का प्रतीक है ।

गणेश जी की चार भुजाएं दिखाई जाती है उनमें से एक में कुल्हाड़ा दिखाया जाता है । कुल्हाड़ा तो काटने का एक साधन है ज्ञानवान व्यक्ति मे ममता के बंधन काटने और संस्कारों को जड़ से उखाड़ने की क्षमता होती है उसी का प्रतीक यह कुल्हाड़ा है । ज्ञान एक कुल्हाड़ी की तरह से है जो उसके मन के जुड़े हुए दैहिक नातो को चूर चूर कर देता है । गीता में भी ज्ञान को तेज तलवार की उपमा दी गई है जिससे कि काम रूपी शत्रु को मारने के लिए कहा गया है । आसुरी संस्कारों को मार मिटाने के लिए ज्ञानरूपी कुल्हाड़ा जिसके पास है वह आध्यात्मिक योद्घा ही ज्ञानी है । हमें गणेश जी जैसा पूजनीय बनाना है तो हमें भी ऐसी बड़ी शक्तियां धारण करनी होगी ।

वरद् मुद्रा

गणपति जी का एक हाथ सदा वरद मुद्रा में दिखाया जाता है । देवता हमेशा देने वाले ही होते हैं । जिसकी जैसी भावना, श्रद्धा होती है उन्हें वैसी ही प्राप्ति अल्पकाल के लिए होती है । वरद मुद्रा इस बात का प्रतीक है ।  जैसे गणेश जी हमेशा दाता के रूप रहते हैं वैसे ही ज्ञानवान व्यक्ति की स्थिति ऐसी महान हो जाती है कि वह दूसरों को निर्भयता और शांति का वरदान देने की सामर्थ वाला हो जाता है । वह अपनी शुभ मनसा से दूसरों को आशीष प्रदान कर सकता है ।

बंधन ( रस्सी )
आत्मा का परमात्मा के साथ नाता जोड़ना भी प्रेम के बंधन में बँधना है । गणपति जी के एक हाथ में जो डोरे (बंधन) हैं वह इसी प्रेम के डोरे हैं । वे दिव्य नियमों के शुद्ध बंधन है । ज्ञानी स्वयं इन नियमों के बंधनों में स्वयं को ढालता है ।

इसका दूसरा भाव है कि आत्मा परमधाम से अकेली आती है जैसे ही वह देह में प्रवेश करती हैं तो कई संबंधों के बंधनो में बंध जाती है और उनके साथ उसका कर्मों का लेखा जोखा शुरू हो जाता है । ऐसे कई  बंधनों में बंधती चली जाती है । इसमें सुख के बंधन कम और दुख के बंधन अधिक होते हैं । इन बंधनों से मुक्त होने के लिए ही आत्मा ईश्वर के पास आती है कि मुक्तिदाता मुझे मुक्त करो ।

मोदक
मोदक शब्द खुशी प्रदान करने वाली वस्तु का वाचक है । लड्डू बनाने के लिए चनों को पीसना, भीगाना, भूनना पड़ता है तब कहीं जाकर वह प्रिय पदार्थ बनता है । इसी प्रकार ज्ञानवान व्यक्ति को भी अनेक कठिनाइयों, संकटों, दुश्वारियों इत्यादि में से गुजरना पड़ता है अर्थात उसे तपस्या करनी पड़ती है । जीते जी मरना होता है और इसी से वह अधिकाधिक मिठास व ज्ञान का रस अपने आप में भरता है । तब वह स्वयं भी सदा खुश रहता है और दूसरों को भी खुशी प्रदान करता है । इस प्रकार हाथ में मोदक का होना ज्ञान निष्ठा, ज्ञान रस से सराबोर स्थिति का प्रतीक है ।

इसका दूसरा भाव यह है कि हम हमेशा मुख से मीठा बोले, कड़वा न बोले हर एक को सुख पहुंचाये, ऐसे बोल बोले कि किसी का मान सम्मान और बढ़े ।

गणपति जी के अलंकारों व प्रतीको का उल्लेख किया गया है इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि गणपति जी, परमपिता परमात्मा द्वारा प्राप्त ज्ञान को गहराई से समझने वाले, उसे जीवन में पूर्णता व्यवहार में लाने वाले, स्वयं लक्ष्य स्वरूप और ज्ञान की शक्तियों को प्राप्त करने वाले ही का प्रतीक है।

गणपति अथवा गणनायक एक प्रकार से प्रजापति अथवा प्रजापिता शब्द का पर्यायवाची है क्योंकि गण और प्रजा लगभग समानार्थक हैं । अतः कहा जा सकता है कि गणपति प्रजापिता ब्रह्मा ही थे यह उनका कर्तव्य वाचक नाम है क्योंकि प्रजापिता ब्रह्मा ने ही परम पिता परमात्मा शिव से ज्ञान को प्राप्त कर ज्ञानियों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया और परमपिता परमात्मा शिव ने उनके पुराने संस्कारों के स्थान पर नए संस्कार और दिव्य बुद्धि प्रदान की । उन्होंने ईश्वरीय बुद्धि के आधार पर नई सृष्टि की स्थापना के कार्य में आए विघ्नों को पार किया इसीलिए वे विघ्न विनाशक भी  हैं ।
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मुंबई के सबसे बड़े लालबाग़चा राजा गणेश उत्सव के बारे में जाने

भारत देश त्यौहार और संस्कृति का देश है |इस देस में सभी जातीके त्यौहार मिलजुलकर एकसाथ बिना कोई भेदभाव से मनायेजाते है |आज हमआपको इसमें से बहुत  ही लोकप्रिय हिन्दू त्यौहारगणेश चतुर्ही के बारे में बताएँगे |येत्यौहार महाराष्ट्र मेंबड़े ही जोरो शोरो के साथ  उत्साह से मनाया जाताहै |मुंबई मेंबहुत ही नामचीन गणेश मंडल जिसका नाम लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेश मंडल प्रमुख आकर्षण है | जो लालबाग गणेश गली रोड मुंबई में स्थित है | ये मंडल की स्थापना वर्ष १९३४ में की गई थी तब से ये गणेश उत्सव मना रहा है | हर साल गणेश चतुर्थी से दस दिन तक बहु ही बड़ी गणेशजी की प्रतिमा को बड़े ही भक्तिभाव पूवर्क स्थापित करते  है जिसका नाम "लालबागचा राजा " रखा जाता है , जो पुरे विश्व का राजा है |यहाँ हम आपको लालबागचा राजा के बारे में कुछ जानकारी देंगे आशा है आपको पसंद आएगी |




लोकेशन : G.D आंबेडकर रोड , लालबाग (सेन्ट्रल मुंबई)
फोन नं : ०२२२४७१३६२६
दर्शन के लिए जरुरी समय : करीबन २० घंटे
दर्शन के लिए समय : सुबह ५:०० बजे से रात तक
नजदीकी हवाई अड्डा : लालबागचा राजा आने के लिए नजदीकी हवाई अड्डा छत्रपति शिवाजीहवाई अड्डा है |
नजदीकी रेलवे स्टेशन : नजदीकी रेलवे स्टेशन मुंबई सेन्ट्रल पड़ता है |
रोड और बस से कैसे आये :लालबाग च राजा मुंबई का दर्शन के लिए आने के लिएआपको कई पब्लिकऔर प्राइवेट वाहन मिल जायेंगे |

   
गणेश चतुर्थी 2018 तारीख ,शुभ मुहूर्त , पूजा समय, पूजा मंत्र और जानिए कैसे मनाया जाता है गणेश उत्सव

लालबागचा राजा के बारे में जानकारी 

मुंबई में गणेश उत्सव के दौरान सभी की नजर प्रसिद्ध ‘लालबाग के राजा’ के ऊपर होती है। इन्हें ‘मन्नतों का गणेश’ भी कहा जाता है। लालबाग में स्थापित होने वाले गणेश भगवान की प्रतिमा के दर्शन के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं और ये भक्तगण कई कई घंटो (२० से २५ घंटे) तक कतारों में खड़े रहते हैं।लालबागच राजा के प्रथम दिन मुख दर्शन होता है | इस दिन बॉलीवुड के सितारे ,देश नेताए ,उद्योगपति जैसे बड़े बड़े लोग दर्शन के लिए पहुच जाते है | कहा जाता है की लालबागचा राजा सबकी मन्नते पूरी करता है | भक्तगण हररोज बाप्पा को नए नए वस्त्र  और कीमती आभूषणो से सजाते है |



लाल बाग के राजा मुंबई के सर्वाधिक धनी देवताओं में शामिल किए जाते हैं। प्रति वर्ष यहां करोड़ों की आमदनी होती है।इस प्रसिद्ध गणपति को ‘नवसाचा गणपति’(इच्छाओं की पूर्ति करने वाले) के रूप में भी जाना जाता है।

अनंत चतुर्दशी के दिन लालबाग के गणेश मूर्ति का विसर्जन गिरगांव चौपाटी में दसवें दिन किया जाता है। इस समय बड़ा सा जुलुस निकला जाता है | जिस में भक्तगन "गणपति  बाप्पा मोरिया" , " घी में लाडू चोरिया " , "अगले बरस तू जल्दी आ " जैसे नारो से बाप्पा को बीदा करते है | 

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ऋषि पंचमी ,सामा पंचमी व्रत,व्रत कथा , व्रत का महत्व ,और व्रत की पूजा विधि

गुजराती केलेंडर अनुशार श्रावणमहिना पूरा होने के बाद भाद्र महिना शुरू होता है | भाद्र महीने में भी के कई त्यौहार आते है ,जिसमे प्रथम सूद पंचमी के दिन सामा पंचमी का त्यौहार आता है | इस त्योहार को सामा पंचमी भी कहते है | अंग्रेजी केलेंडर अनुशार ये त्यौहार सितम्बर महीने में आता है | स्त्रिया रजोदर्शन के  समय दरमियान अनजाने में दोष हो जाते है ,उसको निवारने के लिए सामा पंचमी का व्रत करते है | इससे सारे दोषों का निवारण हो जाते है |


व्रत की पूजा विधि और महत्व


सामा पंचमी का व्रत गुजराती भाद्र महिने के सूद पक्ष के पांचवे दिन किया जाता है | इस दिन जो स्त्रीया व्रत करती है वो सुबह जल्दी उठकर अधेडा का दातुन करके, मिटटी से नहाकर, माथे में अमला की भूकी डालकर ओने बालो को धोना है | इस दिन सामा खाना है और खेत में जो अनाज खेडा ना हो ऐसा अनाज खाना है और फलाहार भी खा सकते हो | दूसरा कोई अनाज खाना नहीं है | स्नान करने के बाद महादेवजी की भक्ति भाव पूर्वक पूजा करनी है | इस तरह पांच साल के लिए यह व्रत करना है | उसके बाद इस व्रत का उजावना करना है | इस समय अरुधती सहित सप्तऋषि की पूजा करनी है और भ्राह्मिन को भोजन करके यथा शक्ति दान दक्षीणा देना है |इस व्रत करने से सर्व दोषों का निवारण होता है |

व्रत कथा 

कई सालो पहेले की आत है .विदर्भ देश में उतंक नमक एक पवित्र भ्राह्मण उसकी पत्नी संध्या और पुत्र-पुत्री के साथ रहता था | पुत्र सुदेश सर्व विद्या में निपुण था |पुत्री सतमा का विवाह हो गया था | दोनों निश्चिंत थे पर एक साल के बाद उनकी पुत्री पर दुःख के बादल छा गए | उनका पतिका  मांदगी के कारण मृत्यु हुआ | वो रोटी हुई उनके माता पिता के पास आई | उन्होंने उस बात जानकर बहुत दुःख जताया पर इसका कोई उपाय नहीं था | उन्होंने पुत्री को आश्वाशन देकर धर्मं कार्य में मन लगाने को कहा |

उतंक और संध्या का मन अब संसार में से उठ गया था | वो जंगल में आश्रम बनाकर पुत्र सुदेश और पुत्री सत्तमा के सस्थ धर्मं परायण जीवन जी रहे थे | सत्तमा धर्महकती में सारा दिन पसर करती फिर ही उनका दिन नहीं पूरा होता तो वो दोपहर को आश्रम के सामने के पेड़ के निचे खटिये ने सो जाती थी |

एक दिन वो सोती थी तब उनके शरीर में से परु निकलने लगा और कीड़े पड़े | यह देखकर सत्तामा गभरा गई और रोती हुई उनकी माता के पास पहुची | माता गभरा गई और सा बात उतंक को बताई | उतंकने सबसे पहेले उनको आश्वाशन देकर पुत्री को नहलाने को कहा | उससे सत्तामा को रहत हुई | उसके बाद संध्या ने बहुत आग्रह के साथ उनके परभाव के बारे में पूछा तो उतंक ने अपने त्रिकाल ज्ञान से पुत्री का भूतकाल का पता करके पत्नी को कहा की सत्तामा एक भ्राह्मन की पत्नी थी | वे रजस्वला धर्म का पालन  नहीं करती थी | रजस्वला स्त्री को इस चार दिन कुछ काम करना नहीं चाहिए और स्पर्श से दूर रहना चाहिए | किन्तु हमारी पुत्री ने वे धर्मं ऋषिपंचमी की निंदा की थी  और सामा पंचमी का व्रत करती कन्याओ की मजाक उड़ाई थी |इसी लिए इस जन्म में पति सुख से वंचित रही उनके शरीर में कीड़े पड़े |

उत्तंक की पत्नी यह जानकर फिरसे विलाप करने लगी | इसी लिए आश्वाशन देते कहा जिस व्रत का अनादर किया उस व्रत को फिरसे आदर करके भक्तिभाव पूर्वक पूरा करे तो इस पाप का निवारण ह सकता है | उन्हों ने व्रत की पूरी विधि बताई , और ऋषि पंचमी के दिन ये व्रत करने से सर्व दोषों का नाश ओगा | उसके बाद नैवेध में फल का प्रसाद रखकर महर्षि कश्यप , विश्वामित्र ,अत्री , भरद्वाज,गौतम ,जामदअग्नि ,अरुधती सहित वशिष्ट का ध्यान करना और उनकी मानसिक पूजा करना | 


सत्तमा ने ये व्रतकी विधि जानकर सामा पंचमी के दिन व्रत का आराम्ह कर दिया | धीरे धीरे उनके शरीर से सन गायब हो गया और सुन्दर स्त्री हो गई दोष मुक्त हो गई | 

सामा पंचम का ये व्रत कोई स्त्री करेगी ,उनकी वार्ता पढ़ेंगी उनके सभी दोष मुक्त होगे और सभी  सुख संपति होंगे | 

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गणेश चतुर्थी 2018 तारीख ,शुभ मुहूर्त , पूजा समय, पूजा मंत्र और जानिए कैसे मनाया जाता है गणेश उत्सव

भारतीय संस्कृति के अनुसार हिन्दू धर्मं में हम जो भी शुभ काम करते है तो सबसे पहेले विघ्न हरता देव श्री गणेशजी को याद करते है | श्री गणेश जी देवाधी देव महादेव भगवान् शंकर और माता पारवतीजी के पुत्र है | उनका जन्म  भाद्रपद मास की चतुर्थी को हुआ था इसीलिए इस दिनको "गणेशचतुर्थी" के नाम से जाना जाता है| गणेश चतुर्थी से दस दिन तक गणपति बाप्पा की प्रतिमा रखकर पूजा आरती करते है और आखरी दिन उनका विसर्जन करते है |गणेश चतुर्थी 'विनायक चतुर्थी' के नाम से भी जानी जाती है। 



लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में पुणे में पहली बार सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाया। आगे चलकर उनका यह प्रयास एक आंदोलन बना और स्वतंत्रता आंदोलन में इस गणेशोत्सव ने लोगों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। आज गणेशोत्सव एक विराट रूप ले चुका है।ज्यादातर महाराष्ट्र में गणेश उत्सव बहुत जोरो शोरो से मनाया जाता है | आज भारत के हर कोने में येउत्सव बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है | इसी तरह इस साल भी गणेश उत्सव बड़े जोरो सोरो से मनाया जायेगा | निचे गणेश उत्सव की तारीख ,शुभ मुहूर्त , पूजा समय  बारे में बात करेंगे|



गणेश चतुर्थी तारीख : १३ सितम्बर २०१८
गणेश विशार्जन तारीख :शरुआत के तिन दिन,पांच दिन, सात दिन और दस दिन 
गणेश जी की मूर्ति स्थापित और पूजा  का शुभ मुहूर्त : 13 सितंबर मध्याह्न - 11:03 से 13:30
 गणेश जी की पूजा मंत्र  

"ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात।।"

"वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।। "

कैसे माने जाता है गणेश उत्सव

लोग श्रद्धा से गणेश जी की मूर्ति की स्थापना अपने घर, गली, मोहल्ले में करते हैं और रोज उनकी पूजा, आरती व रंगारंग कार्यक्रमों से वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।गणपति बाप्पा की प्रतिमा रखने के लिए सुन्दर शुशोभन करते है | रंग बेरंगी लाईट से सजाते है | हररोज बाप्पा को अलग अलग श्रुंगार करते है| गणेश जी की मूर्ति स्थापित करके हररोज गणेशजी की पूजा करते है और सुबह शाम दो बार आरती करते है | बाप्पा को अलग अलग भोग अर्पण करते है | बाप्पा का प्रिय  भोग लड्डू भी अर्पण करते है| शाम को आरती के पश्चात भजन कीर्तन का कार्यक्रम रखते है |तीन, पांच या दस दिन बाद मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन करने के पीछे मान्यता है कि जिस प्रकार मेहमान घर में आते हैं तो कुछ लेकर आते हैं इसी प्रकार भगवान को भी हम हर वर्ष अपने घर बुलाते हैं, वे घर में पधारते हैं तो जरूर सभी के लिए कुछ न कुछ लेकर आते हैं इस प्रकार घर में खुशहाली व सुख-समृद्धि कायम रहती है। "गणपति बाप मोरिया" "घी में लाडू चोरिया" "अगले बरस तू जल्दी आ " जैसे नारों से सारा नगर गूंज उठता है | इस प्रकार गणेश उत्सव मानते है और गणपति बाप्पा के प्रति सच्ची और पक्की भक्ति उदहारण देते है | जय गणेश ..

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जाने शिक्षक दिवस ( टीचर्स डे ) कब और कैसे मनाया जाता है और जाने डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन के बारे में

हर साल 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस  मनाया जाता है। ये दिन है, जब आप उन लोगों के प्रति अपना प्यार और सम्मान दर्शाते हैं, जिनसे आपको जीवन में कुछ खास सीखने को मिला है।इस दिन स्टूडेंट्स अपने टीचर्स  को ग्रीटिंग कार्ड और गिफ्ट्स देते हैं. स्टूडेंट्स अपने-अपने तरीके से शिक्षकों के प्रति प्यार और सम्मान को प्रकट करते हैं. स्कूलों और कॉलेजों में टीचर्स डे सेलिब्रेशन  की तैयारी 5 सितंबर से कुछ दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं ।प्राचीन काल से ही गुरूओं का हमारे जीवन में बड़ा योगदान रहा है। गुरूओं से प्राप्त ज्ञान और मार्गदर्शन से ही हम सफलता के शिखर तक पहुंच सकते हैं। शिक्षक दिवस सभी शिक्षकों और गुरूओं को समर्पित है। इस दिुन शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है।


शिक्षक दिवस का इतिहास 

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंति 5 सितंबर को होती है। उनके जन्मदिन के मौके पर पूरा देश 5 सितंबर को शिक्षक दिवस  के रूप में मनाता है। राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद और महान दार्शनिक थे।उनका कहना था कि जहां कहीं से भी कुछ सीखने को मिले उसे अपने जीवन में उतार लेना चाहिए।वह पढ़ाने से ज्यादा छात्रों के बौद्धिक विकास पर जोर देने की बात करते थे। वह पढ़ाई के दौरान काफी खुशनुमा माहौल बनाकर रखते थे।1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

शिक्षक दिवस कैसे मनाया जाता है? 

इस दिन हर स्कुल और कोलेज में प्रमुख छात्र एक दिन के लिए शिक्षक बनते है और सारा शिक्षण कार्य करते है | सभी छात्र  डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन को याद करते है , इनाम वितरण कार्यक्रम का आयोजन करते है | सभी छात्र दिन के अंत में सभी छात्र और शिक्षको के सामने उनका अनुभव बोलते है | राज्य सरकार और जिला पंचायत द्वारा जो शिक्षक अच्छे अच्छे कार्य करते है और उत्क्रुस्थ कार्य करते है उनको श्रेष्ठ शिक्षक अवोर्ड का आयोजन करते है | 



जानिए डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन के बारे में 

डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन  भारत के मद्रास प्रांत के तिरुतनि नामक स्थान पर गरीब ब्राह्मण परिवार में 5 सितंबर 1888 में पैदा हुए थे। अपने जीवन के बाद के समय में वो देश के पहले उप राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति चुने गये थे। वो एक अच्छे व्यक्ति, दर्शनशास्त्री, आदर्शवादी, शिक्षक और एक प्रसिद्ध लेखक थे।




पूरा नाम : डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
जन्म : 5 सितंबर, 1888
जन्म भूमि : तिरूतनी, तमिलनाडु
मृत्यु   : 17 अप्रैल, 1975
मृत्यु स्थान  : चेन्नई, तमिलनाडु
पिता : सर्वपल्ली वीरास्वामी, 
माता : सीताम्मा
पत्नी :  सिवाकामू
संतान  : पाँच पुत्री, एक पुत्र
पद  : भारत के दूसरे राष्ट्रपति
कार्य काल : 13 मई, 1962 से 13 मई, 1967
शिक्षा :एम.ए.
विद्यालय : क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज
पुरस्कार-उपाधि : भारत रत्न 

बचपन से शिक्षक बनने का सपना 1909 में जाकर पूरा हुआ।जब डॉ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन मद्रास के एक विश्वविध्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर पद पर नियुक्त हुए। इन्होने कलकता और मैसूर विश्वविध्यालयों में प्रोफ़ेसर के पद पर, काशी तथा आंध्रप्रदेश युनिवर्सिटी के कुलपति पद पर भी कार्य किया।

इसके अतिरिक्त डॉ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन जी ने कई राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय मंचो और संगठनो में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। प्रसिद्ध ऑक्स्फ़र्ड युनिवर्सिटी में भी आप दर्शनशास्त्र विषय के प्रोफ़ेसर पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्ष 1948 में डॉ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन सयुक्त राष्ट्र संघ के यूनिस्को की एग्जीक्यूटिव कमेटी के अध्यक्ष पद पर भी कार्य कर चुके हैं। वर्ष 1952 में डॉ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति चुने गये जो 1962 तक इस पद पर बने रहे। 1962 में राधाकृष्णन देश के दूसरें राष्ट्रपति बने जो 1967 तक इस पद पर बने रहे ।

डॉ. राधाकृष्णन के नाम में पहले सर्वपल्ली का सम्बोधन उन्हे विरासत में मिला था। राधाकृष्णन के पूर्वज ‘सर्वपल्ली’ नामक गॉव में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में वे तिरूतनी गॉव में बस गये। लेकिन उनके पूर्वज चाहते थे कि, उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के गॉव का बोध भी सदैव रहना चाहिए। इसी कारण सभी परिजन अपने नाम के पूर्व ‘सर्वपल्ली’ धारण करने लगे थे।

राजनीती में कदम रखने से पूर्व राधाकृष्णन जी ने निरंतर 40 वर्षो तक अध्यापन का कार्य करवाया।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की किताबें

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान दर्शनशास्त्री और लेखक भी थे. उन्होंने अंगेरजी भाषा में 60 से अधिक पुस्तके लिखी जिनमे से प्रमुख किताबे निचे दी गई है |

भारत और चीन
भारत और विश्व
भारत की अंतरात्मा
भारतीय संस्कृति कुछ विचार
भारतीय दर्शन 1
भारतीय दर्शन 2
गौतम बुद्ध जीवन और दर्शन
नवयुवकों से
प्रेरणा पुरुष
स्वतंत्रता और संस्कृति
उपनिषदों का सन्देश

इस महान आत्मा का 16 अप्रैल, 1975 को निधन हो गया लेकिन उनके आदर्श और विचार आज भी हमे प्रेरित करते है|
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इंदिरा गांधी जयंती - इंदिरा गाँधी , प्रियदर्शनी गाँधी का परिचय-भारत की प्रथम और एक मात्र महिला वडाप्रधान

इंदिरा गांधी भारत देश की शक्तिशाली प्रथम महिला वडा प्रधान जो  'प्रियदर्शनी' के नाम से जानी जाती है । यहाँ इस पोस्ट में इंदिरा गाँधी जन्म जयंती और इंदिरागाँधी का जीवन परिचय के बारे लिखा गया है , आशा है आपको पसंद आएगा ।




इंदिरा गाँधी जयंती हर साल १९ वि नवम्बर को मनाया जाता है।इस दिन पुरे देश में जगह जगह पर जुलुश निकले जाते है और  प्रार्थना सभा , सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया जाता है।श्रंद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाता है। अनेक शैक्षिक संस्थानों में इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। कांग्रेस मुख्यालय एवं अन्य कार्यालयों में विशेष आयोजन किये जाते हैं। इन्दिरा गांधी की मूर्ति पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धा अर्पित की जाती है।


इंदिरा गाँधी का परिचय 



पूरा नाम : इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी
जन्म दिनाक : १९ नवम्बर , १९१७
जन्म स्थल : इलाहाबाद -उत्तर प्रदेश
पिता का नाम : पंडित जवाहरलाल नेहरु
माता : कमला नहेरु
पति : फ़िरोज़ गाँधी
संतान : राजीव गाँधी , संजय गाँधी
मृत्यु : ३१  अक्टूबर, १९८४ , नई दिल्ली


श्रीमती इंदिरा गाँधी का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में श्रीमंत नहेरु परिवार में हुआ था । श्रीमती इंदिरा गाँधी स्वंत्रत भारत की पहली महिला वाडा प्रधान थे । उनके पिता जवाहरलाल नहेरु स्वतंत्र भारत के पहले वडा प्रधान थे ।बचपन से ही देश प्रेम और राजनैतिक मूल्यों को अपने दिल में रखकर वे अपने पिता जवाहरलाल नेहरू के साथ ही रहते थे और राजनैतिक नीतिओ की भी शिक्षा ली ।कवि श्री रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें 'प्रियदर्शनी ' नाम दिया था । उनको दुशरे नाम 'इंदु ' और गूंगी गुडिया ' के नाम से भी पहचाने जाते थे ।इंदिरा गाँधी बचपन से ही भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में जुड़े हुए थे ।उनके पिता सक्रीय राजकारणी होने के कारण घर में सदा राजनीती का माहोल रहता था , उसी माहोल में इंदिराजी का पालन पोषण हुआ।उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय बंगाल, इंग्लैंड की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, शांति निकेतन में अपनी शिक्षा पूर्ण की ।

सन १९४२ में उन्होंने अपने पिता की इच्छा के बिना फ़िरोज़ गाँधी पारशी युवक के साथ शादी की । शादी के बाद संजय गाँधी और राजीव गाँधी दो पुत्रो को जन्मा दिया ।सन १९६४ में पिता जवाहरलाल नहरू के अवसान के बाद कोंग्रेस पक्ष द्वारा राज्यसभा के सभ्य नियुक्त किये ।फिर वे उस समय के वडाप्रधान लालबहादुर शास्त्री की सर्कार में प्रधान बने ।लालबहादुर शास्त्री का सन १९६६ में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु होने से कोंग्रेस पक्ष ने इंदिराज को भारत के वडा प्रधान के रूप में नियुक्ति की ।१० साल तक वे भारत के वडा प्रधान रहे ।फिर वो १९८० में फिर से वो वडा प्रधान बने ।

श्रीमती इंदिरा गांधी कमला नेहरू स्मृति अस्पताल, गांधी स्मारक निधि और कस्तूरबा गांधी स्मृति न्यास जैसे संगठनों और संस्थानों से जुडी हुई थीं। वे स्वराज भवन न्यास की अध्यक्ष थीं। वह बाल सहयोग, बाल भवन बोर्ड और बच्चों के राष्ट्रीय संग्रहालय के साथ जुड़ीं।श्रीमती गांधी ने इलाहाबाद में कमला नेहरू विद्यालय की स्थापना की थी।वह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और पूर्वोत्तर विश्वविद्यालय जैसी कुछ बड़ी संस्थानों के साथ जुडी रहीं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय न्यायालय, 1960-64 में यूनेस्को के भारतीय प्रतिनिधिमंडल, 1960-1964 में यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड और 1962 में राष्ट्रीय रक्षा परिषद के सदस्य के रूप में कार्य किया। वह संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय एकता परिषद, हिमालयन पर्वतारोहण संस्थान,दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, नेहरू स्मारक संग्रहालय, पुस्तकालय समाज और जवाहर लाल नेहरू स्मृति निधि के साथ जुडी रहीं।

सन १९७५ में आपातकाल १९८४ में सिख दंगा जैसे कई मुद्दो पर इंदिरा गाँधी को भारी विरोध-प्रदर्शन और तीखी आलोचनाए का सामना करना पड़ा था । उसके बावजूद भी इंदिराजी ने १९७१ के युद्ध में विश्व शक्तिओ के सामने न झुकने के नीतिगत और समयानुकूल निर्णय क्षमता से पाकिस्तान को हरा दिया और बांग्लादेश को मुक्ति दिलाकर भारत देश को समग्र विश्व में गौरवपूर्ण क्षण दिलवाया । उस समय उन्हें "भारत रत्न " से सन्मानित किया गया ।

सन १९८० से १९८४ के समय में जब उनका वडाप्रधान काल चल रहा था तब पंजाब के बटवारे के समय स्वर्ण मंदिर पर आंतकवादियो के सामने हिन्दुस्तानी लश्कर के गोलीबार का हुकुम इंदिरा जीने दिया। उसी समय वहा करीबन १००० निर्दोष लोग मरे गए उसमे ४९० जितने सिख युवान मरे गए । इस हमले के प्रतिकार में पाँच महीने के बाद ही ३१ अक्टूबर १९८४ को श्रीमती गाँधी के आवास पर तैनात उनके दो सिक्ख अंगरक्षकों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।

आखिर में श्रीमती इन्दिरा गांधी एक ऐसी महिला थीं, जो न केवल भारतीय राजनीति पर छाई रहीं बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वह विलक्षण प्रभाव छोड़ गईं। उन्हें 'लौह महिला' के नाम से भी संबोधित किया जाता है। अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता के लिए 'विश्वराजनीति' के इतिहास में इन्दिरा गांधी का नाम सदैव याद रखा जायेगा।
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