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श्यामबाबा(बर्बरीक) का इतिहास और खाटू श्यामजी मंदिर जो राजस्थान के सीकर में स्थित है

राजस्थान के सीकर जिले में खाटू नगर में श्री खाटू श्याम जी का सुप्रसिद्ध मंदिर है , क्योंकि यहीं पर उनके शीश को दफ़नाया गया था।जहा हररोज हजारो भक्तो आते है और उनकी मन्नते पूरी करते है |  मान्यता है कि पहले यहां एक गाय नियमित रूप से दुध की धारा स्वयं बहाती थी। कुछ वर्षों पश्चात वहां खुदाई हुई तो एक शीश प्रकट हुआ। आरंभ में इसे ब्राह्मण को सौंपा गया। मान्यता है कि इसके कुछ समय बाद ही स्वपन में राजा को दिखाई देकर यहा पर मंदिर निर्माण का आदेश दिया इसके पश्चात यहां मंदिर का निर्माण हुआ कार्तिक मास की एकादशी को यह शीश मंदिर में स्थापित किया गया। इसी दिन को बाबा खाटू श्याम के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है।



लोकेशन :खाटूगाव ,सीकरजिल्ला ,राजस्थान 
मंदिर का निर्माण:  1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर ने करवाया था 
प्रवेश : मुफ्त
वाहन पार्किंग : हा
फोटोग्राफी : मंदिर के अन्दर मना
समय :  गर्मियों के दिनों में प्रात: 4:30 से  1:00 बजे और सायं 5:00 बजे से रात्रि 10 बजे तक
सर्दियों में प्रात: के 6:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे और सांय 4:00 बजे से रात्रि 9 बजे तक
मुलाकात के लिए समय : करीबन 1 घंटा
फोन नंबर : +98963 28825, 9812038024, 9996140740, 9812329998, 9992410500, 9813022888, 9812002327
मुलाकात के लिए सही समय : ओक्टो से फरवरी तक 

नजदीकी रेलवे स्टेशन : जयपुर रेलवे स्टेशन (63 किमी )
नजदीकी हवाई अड्डा :जयपुर हवाई अड्डा (63 किमी )
श्यामबाबा(बर्बरीक) का इतिहास  जाने 


बर्बरीक बचपन में एक वीर और तेजस्वी बालक थे. बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण और अपनी माँ मौरवी से युद्धकला, कौशल सीखकर निपुणता प्राप्त कर ली थी. बर्बरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी, जिसके आशीर्वादस्वरुप भगवान ने शिव ने बर्बरीक को 3 चमत्कारी बाण प्रदान किए. इसी कारणवश बर्बरीक का नाम तीन बाणधारी के रूप में भी प्रसिद्ध है. भगवान अग्निदेव ने बर्बरीक को एक दिव्य धनुष दिया था, जिससे वो तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ थे.


जब कौरवों-पांडवों का युद्ध होने का सूचना बर्बरीक को मिली तो उन्होंने भी युद्ध में भाग लेने का निर्णय लिया. बर्बरीक अपनी माँ का आशीर्वाद लिए और उन्हें हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन देकर निकल पड़े. इसी वचन के कारण हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा यह बात प्रसिद्ध हुई.

जब बर्बरीक जा रहे थे तो उन्हें मार्ग में एक ब्राह्मण मिला. यह ब्राह्मण कोई और नहीं, भगवान श्री कृष्ण थे जोकि बर्बरीक की परीक्षा लेना चाहते थे. ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बर्बरीक से प्रश्न किया कि वो मात्र 3 बाण लेकर लड़ने को जा रहा है ? मात्र 3 बाण से कोई युद्ध कैसे लड़ सकता है. बर्बरीक ने कहा कि उनका एक ही बाण शत्रु सेना को समाप्त करने में सक्षम है और इसके बाद भी वह तीर नष्ट न होकर वापस उनके तरकश में आ जायेगा. अतः अगर तीनों तीर के उपयोग से तो सम्पूर्ण जगत का विनाश किया जा सकता है.

ब्राह्मण ने बर्बरीक (Barbarik) से एक पीपल के वृक्ष की ओर इशारा करके कहा कि वो एक बाण से पेड़ के सारे पत्तों को भेदकर दिखाए. बर्बरीक ने भगवान का ध्यान कर एक बाण छोड़ दिया. उस बाण ने पीपल के सारे पत्तों को छेद दिया और उसके बाद बाण ब्राह्मण बने कृष्ण के पैर के चारों तरफ घूमने लगा. असल में कृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा दिया था. बर्बरीक समझ गये कि तीर उसी पत्ते को भेदने के लिए ब्राह्मण के पैर के चक्कर लगा रहा है. बर्बरीक बोले – हे ब्राह्मण अपना पैर हटा लो, नहीं तो ये आपके पैर को वेध देगा.

श्री कृष्ण बर्बरीक के पराक्रम से प्रसन्न हुए. उन्होंने पूंछा कि बर्बरीक किस पक्ष की तरफ से युद्ध करेंगे. बर्बरीक बोले कि उन्होंने लड़ने के लिए कोई पक्ष निर्धारित किया है, वो तो बस अपने वचन अनुसार हारे हुए पक्ष की ओर से लड़ेंगे. श्री कृष्ण ये सुनकर विचारमग्न हो गये क्योकि बर्बरीक के इस वचन के बारे में कौरव जानते थे. कौरवों ने योजना बनाई थी कि युद्ध के पहले दिन वो कम सेना के साथ युद्ध करेंगे. इससे कौरव युद्ध में हराने लगेंगे, जिसके कारण बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ने आ जायेंगे. अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ेंगे तो उनके चमत्कारी बाण पांडवों का नाश कर देंगे.

कौरवों की योजना विफल करने के लिए ब्राह्मण बने कृष्ण ने बर्बरीक से एक दान देने का वचन माँगा. बर्बरीक ने दान देने का वचन दे दिया. अब ब्राह्मण ने बर्बरीक से कहा कि उसे दान में बर्बरीक का सिर चाहिए. इस अनोखे दान की मांग सुनकर बर्बरीक आश्चर्यचकित हुए और समझ गये कि यह ब्राह्मण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है. बर्बरीक ने प्रार्थना कि वो दिए गये वचन अनुसार अपने शीश का दान अवश्य करेंगे, लेकिन पहले ब्राह्मणदेव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हों.

भगवान कृष्ण अपने असली रूप में प्रकट हुए. बर्बरीक बोले कि हे देव मैं अपना शीश देने के लिए बचनबद्ध हूँ लेकिन मेरी युद्ध अपनी आँखों से देखने की इच्छा है. श्री कृष्ण बर्बरीक ने बर्बरीक की वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा पूरी करने का आशीर्वाद दिया. बर्बरीक ने अपना शीश काटकर कृष्ण को दे दिया. श्री कृष्ण ने बर्बरीक के सिर को 14 देवियों के द्वारा अमृत से सींचकर युद्धभूमि के पास एक पहाड़ी पर स्थित कर दिया, जहाँ से बर्बरीक युद्ध का दृश्य देख सकें. इसके पश्चात कृष्ण ने बर्बरीक के धड़ का शास्त्रोक्त विधि से अंतिम संस्कार कर दिया.

महाभारत का महान युद्ध समाप्त हुआ और पांडव विजयी हुए. विजय के बाद पांडवों में यह बहस होने लगी कि इस विजय का श्रेय किस योद्धा को जाता है. श्री कृष्ण ने कहा – चूंकि बर्बरीक इस युद्ध के साक्षी रहे हैं अतः इस प्रश्न का उत्तर उन्ही से जानना चाहिए. तब परमवीर बर्बरीक ने कहा कि इस युद्ध की विजय का श्रेय एकमात्र श्री कृष्ण को जाता है, क्योकि यह सब कुछ श्री कृष्ण की उत्कृष्ट युद्धनीति के कारण ही सम्भव हुआ. विजय के पीछे सबकुछ श्री कृष्ण की ही माया थी.

बर्बरीक के इस सत्य वचन से देवताओं ने बर्बरीक पर पुष्पों की वर्षा की और उनके गुणगान गाने लगे. श्री कृष्ण वीर बर्बरीक की महानता से अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा – हे वीर बर्बरीक आप महान है. मेरे आशीर्वाद स्वरुप आज से आप मेरे नाम श्याम से प्रसिद्ध होओगे. कलियुग में आप कृष्णअवतार रूप में पूजे जायेंगे और अपने भक्तों के मनोरथ पूर्ण करेंगे.


भगवान श्री कृष्ण का वचन सिद्ध हुआ और आज हम देखते भी हैं कि भगवान श्री खाटू श्याम बाबा जी अपने भक्तों पर निरंतर अपनी कृपा बनाये रखते हैं. बाबा श्याम अपने वचन अनुसार हारे का सहारा बनते हैं. इसीलिए जो सारी दुनिया से हारा सताया गया होता है वो भी अगर सच्चे मन से बाबा श्याम के नामों का सच्चे मन से नाम ले और स्मरण करे तो उसका कल्याण अवश्य ही होता है. श्री खाटू श्याम बाबा (Shri Khatu Shyam Baba ji) की महिमा अपरम्पार है, सश्रद्धा विनती है कि बाबा श्याम इसी प्रकार अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाये रखें.
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कार्तिक पूर्णिमा देव दिवाली के स्नान का विशेष महत्व

आप सभी जानते है भारत की पवित्र धार्मिक नदियों में स्नान का हिन्दू धर्म में अत्यधिक महत्व बताया गया है | पर सबसे ज्यादा महत्व का दिन कार्तिक महीने के पूर्णिमा को माना जाता है | माना जाता है की इस दिन स्नान करने से एक हजार बार किये गए गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है |

इस दिन वाराणसी काशी में देव दिवाली त्योहार धूम धाम से मनाया जाता है | मान्यता है कि इस दिन गंगा घाट पर देवता मनुष्यों के साथ दिवाली मनाने आते है |

साथ में यह भी मान्यता है कुम्भ में किये गये स्नान का जितना महत्त्व है उतना ही कार्तिक माह की पूर्णिमा को स्नान के बाद फल प्राप्त होता है |

सूर्योदय पूर्व करे स्नान

यदि आप अधिक से अधिक स्नान द्वारा पुण्य कमाना चाहते है तो स्नान आप सूर्य उदय से पूर्व करे | पवित्र नदियों में स्नान से पूर्व अपने हाथ पैर पहले धो ले फिर आचमन करे और फिर स्नान के समय हाथ में कुशा लेकर स्नान करे |स्नान करते समय आधा शरीर जल में रहे और भगवान शिव विष्णु का ध्यान करते रहे |



पीपल को जल दे और दीप जलाये

लक्ष्मी जी और त्रिदेवो का वास पीपल के पेड़ में बताया गया है | इस दिन स्नान के बाद पीपल के वृक्ष की पूजा करे और जल चढ़ाये और संध्या को दीपदान करे | इससे धन लक्ष्मी प्रसन्न होती है और सुख सम्पति प्रदान करती है |

घर में कैसे करे कार्तिक पूर्णिमा का स्नान

यदि आप पवित्र नदियों पर नही जा सकते तो आप घर में भी इस स्नान का कुछ लाभ ले सकते है | आप नहाने के पानी में पवित्र जल गंगा का मिला कर स्नान कर ले | इसके बाद भगवान सूर्य को जल से अर्घ्य जरुर दे |

पवित्र स्नान के बाद और क्या अच्छे कर्म करे

कार्तिक पूर्णिमा के गंगा स्नान के बाद आप फिर भगवान की भक्ति , गरीबो को दान दक्षिणा , हवन, यज्ञ आदि करके पुण्य कमा सकते है | दान में आप अन्न दान , वस्त्र दान और अर्थ दान दे सकते है | इस दिन दिया गया दान आपके बुरे समय में काम आता है |
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अचलेश्वर महादेव मंदिर जहा दिन में तीन बार रंग बदलता है यह शिवलिंग जो राजस्थान अचलगढ धोलपुर में स्थित है जहा हर मन्नत पूरी होती है

मध्य प्रदेश के मंडला जिले में जहां हनुमान दिन में तीन बार रूप बदलते हैं वहीं उज्जैन में भैरव शराब पीते हैं। ऐसी और भी कई जगहें मौजूद हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते। खैर, आज हम आपको बताएंगे राजस्थान के अचलेश्वर महादेव मंदिर के बारे में। वहां शिवलिंग तीन बार रंग बदलता है।



लोकेशन :धोलपुर ,राजस्थान 
प्रवेश : मुफ्त
वाहन पार्किंग : हा
फोटोग्राफी : मंदिर के अन्दर मना
समय : सुबह के 4:00  से रात के 10 :00 तक
अमावश्या स्पेशल समय : रात के 12:00 बजे से सुबह के 1 :00 बजे तक
मुलाकात के लिए समय : करीबन 1 घंटा
मुलाकात के लिए सही समय : हररोज सुबह -शाम
नजदीकी रेलवे स्टेशन : धोलपुर रेलवे स्टेशन जंक्शन
नजदीकी हवाई अड्डा :आगरा हवाई अड्डा


इस शिवलिंग पर एक निशान भी है जिसे पूजा जाता है। उस निशान को लेकर भी एक मान्यता जुड़ी हुई है। कहां है यह मंदिर? यह कब बना था? इसकी कथा क्या है? यहां किसकी पूजाहोती है? ऐसे ही कई सवालों के जवाब के लिए पढ़िए यह स्टोरी।



अचलेश्वर महादेव मंदिर धौलपुर, राजस्थान के माउण्ट आबू में स्थित है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ भगवान शिव तथा उनके शिवलिंग की नहीं, बल्कि उनके पैर के अंगूठे की पूजा की जाती है। यहाँ भगवान शिव अंगूठे के रूप में विराजते हैं|अचलेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग तीन बार रंग बदलता है। सुबह शिवलिंग का कलर लाल होता है, दोपहर को केसरिया और शाम को कलर सांवला हो जाता है।मंदिर अतिप्राचीन है। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना 2,500 साल पहले हुई थी।




मंदिर में पंच धातु के नंदी की एक विशाल प्रतिमा है, जिसका वजन चार टन है। शिवलिंग के ऊपर एक तरफ पैर के अंगूठे का निशान उभरा हुआ है, जिसे स्वयंभू शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है

यह देवाधिदेव शिव का दाहिना अंगूठा माना जाता है। अँगूठे के बारे में क्या मान्यता है इसे जानने के लिए आगे पढ़ें। 

यह है मान्यता

मान्यता है कि इसी अंगूठे ने पूरे माउण्ट आबू के पहाड़ को थाम रखा है, जिस दिन अंगूठे का निशान गायब हो जाएगा, माउण्ट आबू का पहाड़ खत्म हो जाएगा।

भगवान के दस अवतार के दर्शन 

गर्भगृह के बाहर भगवान विष्णु के दस अवतारों की मूर्तियां भी हैं। इनमें वराह, नरसिंह, वामन, कच्छप, मत्स्य, कृष्ण, राम, परशुराम, बुद्ध व कलंगी अवतारों की काले पत्थर की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। क्या हैं पौराणिक कथाएं, ये जानिए आगे।

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अचलेश्वर महादेव मंदिर गूगल मेप 


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भारत देश संपूर्ण परिचय

भारत देश विश्व का सबसे बड़ा लोकशाही देश है ।भारत देश को बिनसांप्रदायिक देश भी है । राजा 'भरत' के नाम से भारत देश का नाम भारत पड़ा । भारत को हिंदुस्तान भी कहा जाता है । यहाँ आपको भारत देश के बारे में संपूर्ण जानकारी दी गई है , हमें आशा है की आपको वह पसंद आएगा । 


प्राचीन नाम : आर्यावर्त, भरतभूमि , भरतखंड
अर्वाचीन नाम : भारत , इंडिया
भारत की राजधानी :  नई दिल्ली
विस्तार : करीबन ३२.९ लाख चो.किमी
जन संख्या : १ अरब २१ करोड़ (२०१५ )
राज्य : ३१
केंद्र शासित प्रदेश :७
कुल जिले : ६४२
कुल गाँव : करीबन ६.४२ लाख
अक्षांशीय विस्तार : ८°४’उत्तरी अक्षांश से ३७ °६’ उत्तरी अक्षांश तक
देशान्तरीय विस्तार : ६८ °७’ पूर्वी देशांतर से ९७°२५’ पूर्वी देशांतर तक
भारत की सीमा : पूर्व में बर्मा ,पश्चिम में पाकिस्तान,उत्तर में हिमालय,दक्षिण में हिद महासागर
पूर्व से पश्चिम विस्तार : २९३३ कि.मी.
उत्तर से दक्षिण विस्तार : ३२१४ कि.मी.
भारत की स्थलीय सीमा कुल लम्बाई : १५२०० कि.मी.
स्वतंत्रता: १५ अगस्त १९४७ ( स्वतंत्रता दिवस )
प्रजासत्ताक (संविधान ): २६ जनवरी ,१९५०
राष्ट्रभाषा : हिंदी
राष्ट्रगीत : जन गण मन अधिनायक ....(रविन्द्रनाथ टागोर )
राष्ट्रद्व्ज: त्रिरंगा (केशरिया ,सफ़ेद ,हरा -बिच में अशोक चक्र )
राष्ट्रप्रतिक : चार शेर (त्रिमूर्ति )
राष्ट्रीय आदर्श शब्द : सत्यमेव जयते
राष्ट्रीय फल : आम
राष्ट्रीय फूल : कमल
राष्ट्रीय खेल : हॉकी
भारत की कुल भाषाएँ : लगभग १९५२



भारत देश के प्रमुख तीर्थ स्थान  




भारत में अनेक तीर्थ स्थान है और वो सरे जहा में मशहूर है ।भरा के प्रमुख तीर्थ स्थानों के बारे में दिशाओ के अनुशार चार विभाग बनते है ,उत्तर ,दक्षिण,पूर्व ,पश्चीम ।निचे सभी के विभागीय नाम है ।

उत्तर भारत : उत्तर भारत में तीर्थ धाम थोड़े कम है ।जिसमे प्रमुख हरिद्वार , ऋषिकेश ,बद्रीनाथ ,केदारनाथ ,कैलाश पर्वत ,हिमालय ,प्रयाग,अमरनाथ बाबा,उज्जैन ,बनारस ,चित्रकूट ,गोकुल,मथुरा,वृन्दावन, ताजमहल  

दक्षिण भारत : दक्षिण भारत में पुराने और  ऐतिहासिक इमारते, तीर्थ स्थान बहुत अच्छी कला का आज भी जग मशहूर है ।दक्षिण के तीर्थ स्थानों में प्रमुख रामेश्वरम,धनुकोष्ठी ,त्र्यंबक,महाबलीपुरम,हलेबिड ,हसन ,बेलूर,गोमतेश्वर ,मदुराई ,त्रिवेंद्रम ,पद्मनाभ स्वामी मंदिर  का शमाविष्ट होता है ।

पूर्व भारत : पूर्व भारत में प्रमुख जगन्नाथ पूरी ,भुवनेश्वर ,बुद्धगया,खजुराहो  की गणना होती है  ।

पश्चिम भारत : पश्चिम भारत में प्रमुख द्वारका ,सोमनाथ ,पावागढ़ ,डाकोर,अम्बाजी ,नाथद्वारा ,कांकरोली ,केशरियाजी मशहूर ही  ।



भारत देश में सबसे अधिक मशहूर 


तीर्थ स्थल :-धर्मो के अनुसार 



हिन्दू:प्रयाग, काशी ,गया,(तिन यात्राधाम)बद्रीनाथ ,द्वारका ,जगन्नाथपुरी ,रामेश्वर,(चार यात्राधाम ),सोमनाथ,तिरुपति,केदारनाथ,अमरनाथ,द्वादश ज्योतिर्लिंग ।
जैन : समेतशिखर (बिहार ), पलिताना (गुजरात),श्रवण ,बेलगोडा ।
बौद्ध : लुन्गिनी देवी (जन्मस्थान )बुद्धगया (बुद्ध पद ),सारनाथ (प्रथम उपदेश ),कुशिनारा (पारी निर्वाण ),कपिलवस्तु ,वैशाली,राजगिरी ,श्रावस्ती  ।
मुस्लिम : अजमेर ,हाजीमंगल,(मलंग गढ़ , जिल्ला : थाना )
शिख : अमृतसर ,आनंदपुर ,पटना ,नादेड (चार तख़्त )
ख्रिस्ती : वैलंगानी, मद्रास के पास मौलापुर (संत टोमसकी समाधी),गोवा का दो जीसस केथेड्रल 
पारसी : उदवाडा 

सबसे बड़ी नदिया : गंगा (सबसे लम्बी नदी -२६५५ किमी ),यमुना ,चम्बल,ब्रह्मपुत्रा ,महि,गोदावरी ,कृष्णा,कावेरी,नर्मदा,तापी ,बियास,सतलज,तुंगभद्रा,गोमती,कोसी,शोण,शरावती ,पूर्णा,रामगंगा ,दामोदर, गंडक । 

प्रमुख बन्दरगाह : मुंबई ,मर्मगोवा ,मेंग्लोरम ,कोचीन ,कंडला,कलकत्ता,विशाखाटनम,न्हवाशिवा,पारादीप ,तूतीकोरिन ।

अखात : खंभात का अखात ,मनोर अखात,कच्छ अखात 

सरोवर : कुदरती : वुलर,डाल(कश्मीर ),केलेरू (आंध्र प्रदेश),चिलका (उड़ीसा),पुलीकट (तमिलनाडु),ढेबर,पुष्कर,सांभर (राजस्थान),नल सरोवर (गुजरात),ब्रह्म (हरियाणा )
 कृत्रिम सरोवर : गोविंद सागर (भाकरा ),गाँधीसागर( चंबल ),नागार्जुन सागर (कृष्णा ),कृष्ण राजसागर(कवेरी),निझामसागर (गोदावरी),सरदार सरोवर (नर्मदा)

ऊँचे पर्वत : हिमालय ,विन्द्याचल ,अरवल्ली ,सातपुडा, काराकोरम ,पश्चिमघाट, आबू ,गिरनार ,गारो ,खासी, जेतीया,पतकोई,लुसाइ,महादेव,मैकल,पूर्वघाट,श्रेतुंजो । 

हिलस्टेशन : महाबलेश्वर ,माथेरान ,पंचगिनी(महाराष्ट्र),मसुरी,नैनिताल (उत्तर प्रदेश ),कोड़ाइकेनाल,उटाकामल (उटी) (तमिलनाडू ),सिमला ,कुलु-मनाली (हिमाचल प्रदेश),श्री नगर ,गुलमर्ग,पहेलगाव (कश्मीर),शिलोंग (मेघालय),दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल ),आबू (राजस्थान)

बाग बगीचे : निशात बाग ,शालीमार गार्डन (श्रीनगर ),नेशनल पार्क ,हेगिंग गार्डन (मुंबई ),लाल बाग (बेंगलोर ),मुग़ल गार्डन (दिल्ही ),बोटनिकल गार्डन (कलकत्ता),आल्फ्रेड पार्क (इलाहाबाद),वुन्दावन गार्डन (मैसूर),छत्री बाग (इंदोर), पिजोरा बाग ,रोक गार्डन (चंडीगढ़)

भारत के पवित्र मंदिर  


केदरनाथ -उत्तराखंड 
बद्रीनाथ - उत्तराखंड
अमरनाथ -कश्मीर
गाँधी स्मारक -कन्याकुमारी 
सोमनाथ मंदिर - गुजरात 
कमल (लोटस) मंदिर -नई दिल्ही 
काशी विश्वनाथ -वाराणसी 
नंदी मंदिर : कर्नाटक 
बौध मंदिर : गया 
मिनाक्षी मंदिर : मदुराई 
बेलूर मठ -कलकत्ता 
अक्षरधाम -गांधीनगर 
अक्षरधाम -दिल्ही 
साइबाबा मंदिर -शिर्डी 
वैष्णो देवी -जम्मू 
हर की पौड़ी -हरीद्वार 
खजुराहो मंदिर -मध्यप्रदेश 
महाबलीपुरम -तामिलनाडू 
जगन्नाथ मंदिर -पूरी 
गंगोत्री मंदिर -उत्तराखंड 
बिरला मंदिर -नई दिल्ही 
सूर्य मंदिर-कोणार्क 
सारनाथ मंदिर -उत्तरप्रदेश 
भुक्तेश्वर मंदिर -भुवनेश्वर 
शंकराचार्य मंदिर -कश्मीर 
बिरला मंदिर -जयपुर 
रोक मंदिर -तमिलनाडु 
कामाख्या मंदिर -आसाम 
मुक्तिधाम -नाशिक 



भारत की ऐतिहासिक इमारते 


सुवर्ण मंदिर : अमृतसर 
गुरुद्वारा सीस गंज -नई दिल्ही 
दुर्गियाना मंदिर- अमृतसर 
संसद भवन -नई दिल्ही 
केंद्रीय सचिवालय -नई दिल्ही 
जामा मस्जिद -नई दिल्ही 
लाल किल्ला -नई दिल्ही 
गेट वे ऑफ़ इंडिया -मुम्बई 
इंडिया गेट -नई दिल्ही 
जंतर-मंतर-नई दिल्ही 
हवा महल -जयपुर 
ताजमहल -आगरा 
कुतुबमीनार -नई दिल्ही 
गोल्डन ब्रिज -भरूच 
हवरा ब्रिज -कलकत्ता 
विजय स्तंभ -चित्तोड़गढ़ 
चार मीनार -हैदराबाद 
हुमायु मकबरा -नई दिल्ही 
साची स्तूप -मध्यप्रदेश 
राजघाट- दिल्ही  
शांतिवन - दिल्ही 
विजयघाट -दिल्ही 

भारत देश गूगल मेप 



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गोस्वामी संत तुलसीदास भारत के महान संत के बारे में संपूर्ण परिचय

इस पोस्ट में हम आपको भारत के महान संत गोस्वामी तुलसीदास के जीवन के बारे में कुछ सत्य बताएँगे |



पूरा नाम : गोस्वामी संत तुलसीदासजी
जन्म: संवत १६६४ (१५३२ई०)( श्रवण मास का सातवा दिन )
जन्म स्थान: राजापुर, चित्रकूट (उत्तर प्रदेश)
बचपन का नाम: तुलाराम (रामबोला)
पिता का नाम :  आत्माराम दुबे
माता का नाम : हुलसीदेवी 
पत्नी का नाम : रत्नावली
गुरु का नाम : श्री नरहरिदास
भाषा तथा प्रमुख ग्रन्थ: ब्रज तथा अवधी (रामचरितमानस)
मृत्यु: संवत 1680 (असीघाट)




संत तुलसीदास को हिंदी साहित्य के आकाश का एक मात्र नक्षत्र कहा जाता है | संत तुलसीदास भारत देश के बहुत ही बड़े कवि के नाम से भी जाना जाता है | बचपन से ही वह प्रभु श्री राम की भक्ति में डूबे रहते थे |श्री राम के प्रति उनको अपार श्रद्धा थी और जन्म के समय वो रोने के बजाय 'राम राम ' बोलने लगे , इसी वजेसे लोग उन्हें 'राम बोला ' से भी जाने जाते है | बचपन से ही उन्होंने संस्कृत और अन्य भाषा की शिक्षा प्राप्त कर ली थी |कहा जाता है की तुलसीदास अपनी माता के गर्भ में १२ महीने तक रहे उसी वजे से जन्म के समय इनके मुह में पुरे दांत थे, अंत: अशुभ मानकर माता पिता द्वारा त्याग दिये जाने के कारण संत नरहरिदास ने काशी में उनका पालन पोषण किया था | उनके जन्म के चौथे दिनमें  ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी | थोड़े समय बाद उनकी माता की भी मृत्यु हो गई | फिर अपनी माता की एक चुनिया नाम की सेविका उन्हें अपने साथ अपने शहर हरिनगर ले गई | वो भीपांच साल तक उसकी परवरिस करके चल बसी | अब तुलसीदासजी फिर से अकेले हो गए और घर घर भीख मांगके अपना गुजरान चलाने लगे |उसी समय माना जाता है की स्वयं माता पार्वती ने एक ब्राह्मण का स्वरुप धारण करके तुलसीदासजी का पालन पोषण किया था |

तुलसीदासजी का विवाह रत्नावली नामक सुन्दर कन्या से हुआ था |थोड़े समय के बाद उन्होंने तारक नाम के पुत्र को जन्म दिया | थोड़े समय में ही उनके पुत्र की भी मृत्यु हो गई | फिर एक बार उनकी पत्नी अपने मैके गई हुई थी |तुलसीदास को उनसे मिलने का मन हुआ , और वो लोकलज्जा की पर्व किये बिना वहा से निकल पड़े |उस समय धोधमार बारिस चल रही थी पर वो रुके बिना चलते रहे |रस्ते में नदी आई पर अँधेरी रात में पत्नी प्रेम में अंधे तुलसीदास ने एक मरे हुए आदमी की लाश को तरापा मानकर उनपर सवार होकर नदी पार कर ली, और साप को रस्सी मानकर अपनी पत्नी के कमरे में पहुच गए |रत्नावली ने ये सब जाना और तुलसी दास को कहा " जैसी प्रीत हम से , वैसी हरी से होय ; चला जाये वैकुठ में , पल्ला न पकडे कोई ". अर्थात की जैसा प्रेम तुमको मुजमें है , वैसा प्रेम जो भगवन में हो तो मोक्ष की प्राप्ति हो जाये |बस तुलसी दास को इस वचनों ने हदय में छेद कर दिये और हानी पहुचाई ,और उसी समय से संसार का त्याग किया |और साधू जीवन अपना लिया |

संत तुलसीदास ने हमारे रामायण को संस्कृत भाषा में से हिंदी भाषा में अनुवाद किया | 'रामचरित मानस ' जैसे महाकाव्य की रचना भी की |उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर श्री राम और लक्ष्मण ने चित्रकूट में उनको साक्षात दर्शन भी दिए | उन्होंने और भी विनय पत्रिका ,कवितावली, दोहावली , गीतावली, बरवै रामायण ,जानकी मंगल ,रामलला नहछू ,वैराग्य संदीपनी , कृष्ण गीतावली , पार्वती मंगल ,रामाज्ञा प्रश्न , हनुमान बाहुक,तुलसी सतसाई , जैसी रचनाओ का भी निर्माण किया | सचमुच तुलसीदासजी संस्कृत विद्वान होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है। तुलसीदास जी को महर्षि वाल्मीकि का भी अवतार माना जाता है जो मूल आदिकाव्य रामायण के रचयिता थे।
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अश्‍वत्थामा महाभारत के एक अजय और अमर योद्धा जो आज भी जिन्दा है

अश्‍वत्थामा  श्री गुरु द्रोण  और कृपी माता के पुत्र थे | अश्‍वत्थामा का जन्म द्वापर युग में हुआ था | कहा जाता है की जब अश्‍वत्थामा  का जन्म हुआ तब उचैश्रवा अर्थात इंद्र के अश्व की जैसा उसकी आवाज हुई थी , जो चारो दिशाओ में गूंजा था |इसी लिए उसका नाम अश्‍वत्थामा  रखा गया |अश्‍वत्थामा  बहुत ही साहसी और शक्तिशाली योद्धा थे |महाभारत के युद्ध में वो अकेले ही सभी को हरा सके उतनी उनमे शक्ति थी | अश्‍वत्थामा धनुरविद्या में अर्जुन जितने श्रेष्ठ थे , क्युकी वे सभी  दिव्यास्त्र ,आग्नेयास्त्र ,वरुणास्त्र, पर्जन्यास्त्र,ब्रह्मास्त्र ,नारायणस्त्र,ब्रह्मशिरस्त्र आदि चलाना जानते थे और उनके सभी रहस्य जानते थे |गुरु द्रोणाचार्य ने अश्‍वत्थामा  को उत्तर पंचाल का आधा राज्य दिलाया था |उसके सिवा नारायणास्त्र मात्र अश्‍वत्थामा ही चला जानते थे |उसका उपयोग उन्होंने अपने पिता  गुरु द्रोणाचार्य की महाभारत के युद्ध के समय क्रोधित होकर पांडवो पे किया था | 


गुरु द्रोणाचार्य ने ब्रह्मास्त्र चलाना अर्जुन और अश्‍वत्थामा दो ही को सिखाया था |उसका उपयोग दोनों ने महाभारत में किया था , किन्तु नारद मुनि ने उसको वापस लेने को कहा तब अर्जुन ने उनकी बात मानकर वापस ले लिया और अश्‍वत्थामा ने ऐसा नहीं किया , और ब्रह्मास्त्र का प्रहार अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित  जो उस समय गर्भ में था उस गर्भ पर उसको को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया था। लेकिन तब भगवान श्रीकृष्ण ने परीक्षित की रक्षा की, और अश्वत्थामा को सजा देने के लिए उनके माथे से मणि निकाल ली। और अश्वत्थामा को युगों-युगों तक भटकते रहने का श्राप दिया।इस महाभारत के युद्ध में १८ लोग जिन्दा बचे थे उनमे से एक ये अश्‍वत्थामा थे |जो आज भी अजय और अमर है |

कहा जाता है की आज भी मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के असीरगढ़  के किल्ले में अश्‍वत्थामा के मौजूद होने के अवशेष पाए है | वहा महाभारत काल का पुराना शिव मंदिर है, जो गुप्तेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है |वहा हररोज सुबह को शिवजी पर ताजे फुल की पूजा की होती है |किल्ले के आसपास घना जंगल है और शाम को कोई भी वहा भटकता नहीं है | कहा जाता है की हररोज रात को अश्‍वत्थामा यहाँ आते है और ताजे फूलो से भगवन शिव की पूजा करते है | सुबह को जब मंदिर खोला जाता है तो वो ताजे फुल भी वहा शिवलिंग पर पाए जाते है | गाव के  निवासियों के अनुसार कभी-कभी वे अपने मस्तक के घाव से बहते खून को रोकने के लिए हल्दी और तेल की मांग भी करते हैं।गांव के कई बुजुर्गों की मानें तो जो एक बार अश्वत्थामा को देख लेता है, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है |

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी (मोहनदास करमचंद गाँधी) के बारे में संपूर्ण जानकारी

इस पोस्ट  में हम आपको हमारे राष्ट्रपिता 'महात्मा गांधीजी ' के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे |

पूरा नाम: मोहनदास करमचंद गाँधी 
जन्म स्थान: पोरबंदर , गुजरात , भारत 
जन्म दिनाक : २ अक्टूम्बर . १८६९
पिता : करमचंद गाँधी
माता: पुतलीबाई 
अभ्यास : एल .एल बी , वकीलात 
पुत्र: हरिलाल,मणिलाल , रामदास , देवदास 
मृत्यु: ३० जनवरी १९४८  ,दिल्ही  



" देदी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल , साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल ", ये पंक्ति जिनके लिए बनायीं गयी है वो  साबरमती के संत "महात्मा गांधीजी" जिसे हम प्यार से 'बापू ' बुलाते है इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी है | गांधीजी ने अपनी मेट्रिक परीक्षा  राजकोट की आल्फ्रेड हाइस्कुल में से पूरी की|कालेज की पढाई शामलदास कालेज भावनगर में प्रथम सत्र पूर्ण करके लंडन पहुच गए , और वहा से बेरिस्टर की पदवी प्राप्त करके भारत परत आ गए | उसके बाद वो मुंबई और राजकोट की असफल वकीलात बाद  दक्षीण आफ्रिका पहुचे|१८९४ में वहा के हिन्दियो के हक के लिए 'नाताल इंडियन कोंग्रेस 'की स्थापना की |फिर दक्षीण आफ्रिका में हुए भारतीयों से अन्याय के करान सन १९१५ में वे भारत लौटे और अहमदबाद में 'सत्याग्रह आश्रम ' की स्थापना की | 

गांधी जी ने वर्ष १९१७-१८के दौरान बिहार के चम्‍पारण नामक स्‍थान के खेतों में पहली बार भारत में सत्‍याग्रह का प्रयोग किया। यहाँ अकाल के समय ग़रीब किसानों को अपने जीवित रहने के लिए जरूरी खाद्य फ़सलें उगाने के स्‍थान पर नील की खेती करने के लिए ज़ोर डाला जा रहा था।उस समय गांधीजी ने अंग्रेजो के सामने सत्याग्रह करके उनको उनका हक दिलवाया |सन १८१८ में 'खेडा सत्याग्रह' किया| सन १८१९ में 'रोलेक्ट एक्ट ' का विरोध किया|सन १९२० में इंडियन नॅशनल कोंग्रेस के सहकार से 'असहकार आन्दोलन ' की शुरुआत की  उसी ही वर्ष में उस कार्यक्रम के भाग के रूप में गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की | सन १९२२ में अंग्रेज अमलदारो ने गांधीजी को बंदी बनाया और जेल में ले गए |दो साल बाद १९२४ में उनको रिहा किये गए |सन १९२४-२५ में 'अस्पृश्यता निवारण ' और ' खादी के उत्पादन का रचनात्मक कार्य की शुरुआत की | 'हरिजन बंधू ' और 'हरिजन सेवक ' वृत पत्रों का संपादन किया | १९२८ में बारडोली सत्याग्रह में सहयोग दिया | सन १९३० में नमक के कायदे के लिए दांडी यात्रा आरंभ की और वहा नमक का कानून तोड़ दिया और अंग्रेज सरकार को जुका दिया| सन १९४२ में उन्होंने 'हिन्द छोड़ो 'आन्दोलन के बाद अंग्रेजो भारत से नकल जायेंगे वह तय कर दिया | आखिर में सन १९४७ की १५ अगस्त को भारत देश स्वंतंत्र हो गया | 

सदियों से गुलाम बने भारत देश को स्वतंत्र कराना गांधीजी का सबसे बड़ा महान कार्य था |दुनिया के इतिहास में यह एक नया प्रयोग था , इसी लिए गांधीजी 'युग पुरुष ' कहलाए |गांधीजी पवित्र ह्दय  के महापुरुष और महान समाज सुधारक थे | उन्होंने नए समाज की नीव डाली |अछूतो की दुर्दशा उनसे देखि न  गई और उन्होंने उनका उद्धार  करने का बीड़ा उठाया |गरीब भारत को उन्होंने तकली और चरखे द्वारा रोजी रोटी दी |मद्य-निषेध , नीरक्षरता-निवारण , स्त्री -शिक्षा, ग्रामोद्वार आदि के लिए उन्होंने राष्ट्रभाषा का प्रचार किया और हिन्दू -मुस्लिम एकता के लिए वे आजीवन प्रयत्न करते रहे| 

गांधीजी सत्य और अहिंसा के पूंजारी थे | उनके जीवन में सादगी की महक आती थी | दुर्बल शरीर और घुटनों से ऊँची एकमात्र धोती पहननेवाले गांधीजी भारत की गरीबी के प्रतिक थे | दया , धर्मं और प्रेम की त्रिवेणी उनके हदय से लगातार बहा करती थी | अंग्रेजो के प्रति भी वो सदा क्षमाशील रहे | दक्षीण  अफ्रीका में जिस मीर आलम पठान ने उनके दात तोड़ दिए थे , उसे भी उन्होंने जेल से छुडाया और अभय दान दिया |वे अन्याय को दूर करने के लिए अपने जीवन को भी दाव पे लगा देने से नहीं डरते थे |आखिर में ३० जनवरी १९४८  की शाम को जब वह एक प्रार्थना सभा में भाग लेने जा रहे थे, तब एक युवा हिन्दू कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी |

सचमुच , गांधीजी ने अपना सर्वस्व न्योछावर करके वर्त्तमान भारत का नवनिर्माण किया | वास्तव में वे हमारे राम, महावीर और बुद्ध थे | 

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विश्व में पहेचाना जाता है भारत देश अपनी भारतीय संस्कृति के लिए जानिए

भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है जो लगभग ५००० हजार वर्ष पुरानी है। विश्व की पहली और महान संस्कृति के रुप में भारतीय संस्कृति को माना जाता है | पुरे विश्व में भारत देश अपनी संस्कृति के लिए पहचाना जाता है | भारतीय संस्कृति को विश्व की सभी संस्कृतियो की जननी कहा जाता है |भारतीय संस्कृति में पहेले धर्मं की संस्कृति को जाना जाता है | भारत देश बिनसांप्रदायिक देश है| इस देश की सबसे बड़ी संस्कृती में ये बात आती है | बिनसांप्रदायिक का अर्थ होता है सभी धर्मं के लोग को रहेने का अधिकार और कोई भी धर्मं अपनाने का अधिकार |भारत देश में हिन्दू,मुस्लिम,शिख,पारशी,इसाई, जैन सभी धर्मो के लोग हिल मिल कर रहेते है और एक दुशरे से कदम से कदम मिलकर चलते है |भारत देश में बड़े बड़े संत महात्मा और रिशिमुनियो, ने हमें धर्मं ग्रन्थ, वेद, उपनिषद, पूरण,श्रीमद भगवद जैस धर्मं ग्रन्थ, और सभी धर्मो के धर्मं ग्रन्थ की बहुत ही बड़ी भेट दी है , जिससे हमें अच्छे और सरल जीवन जीने के तरीके सिख सखते है |

भारत देश पर मुघलो , अंग्रेजो ,राजपूतो जैसे अनेको ने राज किया और उन्होंने ऐसे ऐसे इमारतों और ग्रंथो की रचना की की आधुनिक समय में हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते | उससे पहले कहा जाता है की सतयुग में भगवान ने भी इस भारत देश की धरती पर अवतार लिए है | किसी भी देश की संस्कृति में ऐसी बात नहीं लिखी होती जो भारतीय संस्कृति का एक हिस्सा है | इस देश में श्रीराम,श्री कृष्ण,संत कबीर,महमद साहेब पयगम्बर, गुरु गोविंद ,शंकर पार्वती ,अल्लाह, प्रभु इशु, जैसे भगवन को पूंजा जाता है | भारत देश सम्राट अशोक, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप,रानी लक्ष्मी बाई,पन्ना धाइ , सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे वीर की भूमि है | स्वामी विवेकानंद ,राज राम मोहनराइ ,महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरु, जैसे देश सेवको ने इस देश की संस्कृति को बचाने के लिए अपने प्राण तक दाव पर लगा दिए | 

भारतीय संस्कृति आज भी हमें धर्म का ज्ञान,रीती रिवाजो,जीवन जीने के निजी तरीके,मान सन्मान,त्याग,बलिदान, हिलमिल कर रहना , सत्य , अहिंसा, जरूरत मंदों कि मदद करना जैसे मूल्यों को सिखाती है | आज भी सरे विश्वके लोगो ने भारतीय संस्कृति को अपनाया है |भारतीय संस्कृति में स्त्री को बहुत मन सन्मान दिया जाता है और घर की इज्जत माना जाता है | हिन्दू धर्म में गृह लक्ष्मी माना जाता है | भारत में दिन सूर्य नमस्कार के साथ शुरु होता है | इसमें लोग सूर्य को जल चढ़ाते हैं और मंत्र पढ़कर प्रार्थना करते हैं | भारतीय लोग प्रकृति की पूजा करते हैं और यह इस संस्कृति की अनूठी बात है| हिंदू धर्म में पेड़ों और जानवरों को भगवान की तरह पूजा जाता है | लोग भगवान में विश्वास रखते हैं और कई त्यौहारों पर उपवास रखते हैं| वे सुबह का ताज़ा खाना गाय को और रात का आखिरी खाना कुत्ते को देते हैं | दुनिया में कहीं भी इस तरह की उदारता नहीं देखी जाती |


हमारे राष्ट्र की ये महान संस्कृति है कि हम बहुत खुशी के साथ अपने घर आये मेहमानों की सेवा करते है क्योंकि मेहमान भगवान का रुप होता है इसी वजह से भारत में “अतिथि देवो भव:” का कथन बेहद प्रसिद्ध है| हमारी संस्कृति की मूल जड़ इंसानियत और आध्यात्मिक कार्य है| भारत देश के लोग अपने उत्सव जैसे की दिपावली , होली,रक्षाबंधन, नवरात्री,दशहरा,जन्माष्टमी,नाताल, ईद-ए-मिलाद , पतेती, बैसाखी जैसे त्यौहार धामधूम से मनाये जाते है , और भारतीय संस्कृति का डंका सारे विश्व में बजाते है | भारत देश के लोक मेले तो भारतीय संस्कृति का एक अहम् हिस्सा है |भारतीय शास्त्रीय नृत्य, जैसे भरतनाट्यम, कथकली, कत्थक, मणिपुरी, ओडिसी और कुचिपुड़ी मुख्य तौर पर नाट्य शास्त्र, पुराण और शास्त्रीय साहित्य और रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के संकेतों का पालन करना भारतीय संस्कृति का एक आयना सारे विश्व के सामने है |भरता के कारीगरो की कला कारीगरी के उदहारण के रूप में ताजमहल, लाल किल्ला, कुतुबमीनार ,सोमनाथ मंदिर,पद्मनाभ स्वामी मंदिर,चर्च ,गिरजाघर जैसी कलात्मक इमारते पुराने समय से भारतीय संस्कृति का प्रचार कई सालो से पुरे विश्व में कर रहे है और एक अद्भुत कलात्मक कारीगरी का जीता जागता उदहारण है |

भारतीय संस्कृति हमें बहुत ही सिकहती है | आज नयी पीढ़िया हमारी संस्कृति को भुलाकर दुशरे देश की संस्कृत अपनाने जा रही है पर सचमे भारतीय संस्कृति को बहार के देश और लोग भी अपना रहे है , तो हम भारतीय है , तो अपनी संस्कृति को कभी भूलना नहीं चाहए ,बल्कि सरे विश्व में इसका प्रचार करना चाहए |
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